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Tuesday, 15 February 2022

Valentine's Day: प्यार का एक समीकरण...!?

VALENTINE's DAY: An Equation of Love..!? (वैलेंटाइन्स डे: प्यार का एक समीकरण...!?)

लेखक: राजेश डी. हजारे (RDH Sir)


आज 14 फरवरी है। 14 फरवरी- 'वैलेंटाइन डे' - प्यार का इजहार करने का एक दिन। वैसे देखा जाए तो यह एक पश्चिमी त्योहार! परंतु ऐसी कौन सी पश्चिमी चीज है जिसे हम भारतीयों ने स्वीकार नहीं किया? वैसे प्यार का इजहार करने के लिए अलग से किसी एक दिन की आवश्यकता नहीं हैं। लेकिन कोई बात नहीं; होना चाहिए एक दिन ऐसा भी 'प्रेम दिवस' के रूप में केवल प्रेम को समर्पित...!

प्रेम (प्यार)! "ढाई पवित्र अक्षरों का संगम है प्रेम (प्यार)।" पर आज प्रेम यह शब्द कानों पे आते ही अथवा होठों से निकलते ही नयनों के समक्ष आते हैं दो परलिंगी पंछी==> युवक - युवतियां और किशोर उम्र के बालक एवं बालिकाएं भी..! आज पवित्र शब्द प्रेम अधिक से अधिक अपवित्र होता जा रहा है और समाचार पत्रों और समाचार चैनलों पर दैनिक अपराध से संबंधित अपराधों से यह सिद्ध भी होता है!

"वास्तव में प्रेम ही सृष्टि के चक्र को नियंत्रित करने का एकमात्र आधार है। प्रेम के बिना एक क्षण सांस लेना भी संभव नहीं है।" हो सकता हैं, शायद मेरे मित्र मुझे प्रेमविरोधी के रूप में भी जानते हो। पर सच तो यह है कि मैं बिलकुल भी प्रेम-विरोधी नहीं हूं। मुझे 'प्यार' शब्द से कोई आपत्ति नहीं है..! जब भगवान भी पवित्र प्रेम का विरोध नहीं करते तो मैं कौन होता हूं प्यार का विरोध करनेवाला? मैं आज के युवाओं के विचारहीन प्रेम का विरोध करता हूं।

मैं पूछना चाहूँगा कि क्या प्रेम केवल प्रेमी-प्रेमिका का ही होता है? तो नहीं। प्यार माँ-बच्चा, प्राणी-पक्षी, गाय-बछड़े, दोस्त-दोस्त, प्रेमी-प्रेमिका और भाई-बहन में भी होता हैं। मेरा आज के युवक-युवतियों के पवित्र प्यार को भी विरोध नहीं हैं किंतू ऐसे पवित्र प्रेम करने वाले प्रेमी युगलों को ढूंढने निकले तो शायद हाथ - पैरों की 20 उंगलियां भी ज्यादा हो जाए! और यही चिंताजनक विषय है।

आज प्रेम शब्द देख-भाल, परवाह, दायित्व, संरक्षण, भावना एवं एक दूसरे के प्रति समर्पण का नहीं बल्कि देह-सुख के लिए भोग का शब्द बनकर रह गया है। हर एक इंसान प्यार का उपयोग अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुरूप करने लगा हैं। बदलते वक्त के साथ-साथ प्यार कि परिभाषा भी बदल गई हैं। "आज की पीढ़ी प्यार के नाम पर वासना के मोह कि ओर खींची जा रही है।" यह लेख लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य प्रेमी, प्रेमिका, प्रेम या वैलेंटाइन डे का विरोध करना बिल्कुल भी नहीं है; लेकिन मै जानता हूं की आज के नवसीखे शौकीन-मिज़ाज पागलप्रेमी युगल मुझे लैला-मजनू, हीर-रांझा, सलीम-अनारकली, देवदास-पारो और रोमियो और जूलियट के ऐतिहासिक पवित्र प्यार की मिसालें देंगे, लेकिन वह पवित्र प्यार अब बचा नहीं है और भविष्य में वैसा प्यार दोहराया जाएगा इसकी भी कोई संभावना नहीं है। क्योंकि वैसी सहनशीलता आज के युवाओं में बची ही नहीं है। और जिन्होंने प्रेम कि पवित्रता को शुद्ध जल के समान संजोकर रखा हैं; उन्हें मेरे विचारों का विरोध करने का अथवा आपत्ति जताने का कोई कारण नहीं है; इसके विपरीत, वे इस लेख की सच्चाई और वास्तविकता को जानेंगे तथा भली - भांति समझेंगे।

आज प्रेमी + प्रेमिका = प्यार (LOVE) = वासना (LUST) और यह वासनापूर्ण प्यार से ही बाद में होते है शारीरिक संबंध (Physical Relations/SEX) और अगर किसीने भविष्य में मना किया या 'धोखा' दिया तो बाद बाद में होते हैं--- 'बला xxx (R×××) और हत्या..! और ये सब होते हुए अगर लोग LOVE = SEX का समीकरण बना भी रहे हैं, तो इसमें वह क्या गलत कर है? आज अधिकांश (कुछ अपवादों को छोड़कर) प्रेमी युगलों ने ऐसा समीकरण तैयार करने पर विवश कर दिया हैं एवं अपनी हरकतों से यह समीकरण सही भी साबित किया हैं..!
ये हुए वर्तमान प्रेम के संबंध में मेरे विचार... खैर...!

आज 14 फरवरी अर्थात 'वैलेंटाइन्स डे' है। इस दिन को मनाने के लिए मूलतः मेरा विरोध हैं ही नहीं..! 14 फरवरी 'वेलेंटाइन' नाम के दो अलग-अलग संतों की शहादत का दिन है जिन्होंने रोम और तर्नी यह दो अलग-अलग देशों में प्रेम का संदेश दिया। यह दिन प्रतिवर्ष उन्ही दो महान संतों का प्रेम का संदेश देकर (प्रेम का इज़हार कर) मनाया जाता हैं। इस दिन हम किसी को भी हैप्पी वैलेंटाइन डे कहकर शुभकामनाएं दे सकते हैं। यहां तक कि माता-पिता, दोस्त, भाई-बहन, छात्र-शिक्षक, सहकर्मी, पड़ोसी और प्रेमी-प्रेमिका को भी..! कोई मतलब कोई भी! ऐसा हर कोई जिसे हम प्यार करते हैं। हां ..! आपका वेलेंटाइन कोई भी हो सकता है! यह दिन उन लोगों के लिए अपने प्यार का इजहार करने के लिए हैं, जिनसे आपने कभी अपने प्यार का इजहार नहीं किया। उन्हें अपनी ओर से पवित्र प्रेम का प्रस्ताव देने का दिन हैं जिसे हम अंग्रेजी में propose कहते हैं... और जवाब में 'केवल हां' की उम्मीद करना भी सही नहीं है। जिन लोगों को अपना प्यार जताने के लिए हम कभी समय ही नहीं निकाल पाए उन लोगों के लिए अपने प्यार का इजहार करने के लिए यह एक खास दिन है...

मुझे समझ नहीं आता कि क्यों एक पाश्चात्य त्योहार कह कर केवल इसी एक दिन का विरोध किया जाता हैं? विरोध का शायद एक वाजिब कारण अवश्य है कि - 'वेलेंटाइन्स डे' के नाम पर मिली आजादी की आड़ में प्रेमी-युगलों का सड़कों पर अश्लील हरकते करते हुए घूमना तथा सभी मर्यादाएं भूल जाना.... इस एक बात को अगर छोड़ दें तो मुझे नहीं लगता कि वैलेंटाइन्स डे का विरोध करने का कोई कारण है; और अगर उपरोक्त प्रकार बंद हो जाते हैं, तो इस दिन का विरोध करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी...

खैर ...! अंत में, अगर मेरे शब्दों से कुछ शौकिया प्रेमियों को ठेस पहुंची हो, तो मुझे क्षमा करें ...! पवित्र प्रेम को जानने और उसका अनुकरण करनेवाले शायद मेरे शब्दों तथा विचारों का समर्थन ही करेंगे ऐसा मुझे लगता है।

अंत में एक ही संदेश देना चाहूंगा- चलो शांतिपूर्ण और सभ्य तरीके से जिएं, हर एक से प्यार करें, और पवित्र प्रेम का संत वेलेंटाइन का संदेश पूरी दुनिया में फैलाएं

Happy Valentine's Day..!

  • टिप्पणी: यह लेख 2013 में वेलेंटाइन डे पर राजेश डी. हजारे (RDH Sir) द्वारा मूलतः मराठी में लिखे गए लेख व्हॅलेंटाईन डे- एक समीकरण प्रेमाचे...??? (जो 22 से भी अधिक देशों के पाठकों द्वारा पढ़ा गया हैं।) का हिंदी अनुवाद हैं।

  • लेखक: राजेश डी. हजारे (RDH Sir)

   आमगाँव, जिला गोंदिया (महाराष्ट्र)
    दूरभाष क्रमांक (मो.नं): 7588887401
    हिंदी अनुवाद एवं प्रथम प्रकाशन: 14 फरवरी 2022
   प्रथम प्रकाशन (मराठी): 15 फरवरी 2013
    अद्यतन और पुन:प्रकाशन: 14 फरवरी 2017, 2018, 2020, 2021 और 2022


  • © इस लेख के सभी अधिकार लेखक राजेश डी. हजारे (RDH Sir) के पास सुरक्षित हैं और लेखक की लिखित अनुमति के बिना, इस लेख को किसी भी आंशिक संशोधन के साथ या गुमनाम रूप से प्रकाशित / अग्रेषित नहीं किया जा सकता है /
  • (इस लेख के लेखक अखिल भारतीय मराठी साहित्य परिषद के गोंदिया जिले के पूर्व अध्यक्ष और काव्यप्रेमी शिक्षक मंच के पूर्व गोंदिया जिला प्रमुख हैं।)
  • मूल स्रोत (मराठी): व्हॅलेंटाईन डे- एक समीकरण प्रेमाचे...???

Wednesday, 15 August 2018

'SMS पाठवल्याने माणूस राष्ट्रप्रेमी होतो का?'

प्रिय भारतीय बहिणी व भावांनो ..! आज १५ ऑगस्ट २०१८. भारताचा ७२ वा  स्वातंत्र्य दिन... भारताला स्वातंत्र्य मिळून ७१ वर्षे झालीत. आपण ७१ वर्षाँपासून मोठ्या थाटात स्वातंत्र्य दिन साजरा करतो. अवघा भारत देश अगदी देशभक्तीच्या उल्हासात या दिवशी ऊर्मीत येतो. १५ ऑगस्ट जातो आणि मग देशाची परिस्थिती व भारतीयांची देशभक्ती पहावयास मिळते ती 'जैसे थे!' अशीच देशभक्ती आम्हा भारतीयांमध्ये वर्षात परत जागृत होते ती २६ जानेवारी रोजी. आणि यानंतरही जर कधी ती निर्माण झालीच तर कुण्या समाजसेवकाने क्रांतीची मशाल पेटविल्यास; पण आता तर ते ही कमी झालंय... काय आपण खरंच राष्ट्रीय सण (स्वातंत्र्य व प्रजासत्ताक दिन) साजरे करतो.. !

राष्ट्रीय सणांचा अर्थ काय? कशासाठी साजरे केले जातात राष्ट्रीय सण? 

Friday, 14 April 2017

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर - अल्पपरिचय व जीवनदर्शन व कार्य

अल्प परिचय
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर (स्त्रोत: WikiPedia.org)

  • नाव: भीमराव रामजी आंबेडकर
  • जन्म: 14 एप्रिल 1891
  • जन्मस्थळ: महु (मध्यप्रदेश)
  • मुळ गाव: मु. आंबवडे ता. मंडणगढ जि. रत्नागिरी (महाराष्ट्र)
  • परिवर्तीत नाव: बाबासाहेब आंबेडकर
  • मुळ धर्म: हिंदू
  • परिवर्तीत धर्म: बौद्ध
  • मुळ आडनाव: सपकाळ, आंबवडेकर
  • परिवर्तीत आडनाव: आंबेडकर
  • आईचे नाव: भीमाबाई/भीमाई
  • घरी प्रचलित नाव: भीवा
  • जात: महार
  • पहिले गुरू: भगवान गौतम बुद्ध 
  • दुसरे गुरू: संत कबीर 
  • तिसरे गुरू: महात्मा जोतिबा फुले 

Monday, 1 December 2014

मराठीचा महाराष्ट्रात आदर व्हायलाच हवा

अनुदिनी ==> 101 वी

दिवस ===> 799 वा


तीन दिवसांपुर्वी 28 नोव्हेंबर 2014 रोजी महात्मा ज्योतिराव फुले यांचा 124व्या जयंती निमित्त अखिल भारतीय समता परिषदेतर्फे यावर्षीचा 'समता पुरस्कार' प्रसिद्ध ज्येष्ठ मराठी साहित्यिक 'कोसला'कार श्री भालचंद्र नेमांडे यांना प्रदान करण्यात आला. रु.1लाख रोख, स्मृतीचिन्ह व महात्मा फुले यांची पगडी स्वरुप 'समता पुरस्कार' मिळाल्याबद्दल सर्वप्रथम भालचंद्र नेमाडे यांचे अभिनंदन!

या पुरस्कार समारंभप्रसंगी नेमाडे यांनी आपले मनोगत व्यक्त करताना दोन वादग्रस्त विधाने केलीत (अर्थातच ती जास्तही असु शकतात पण माझ्या ऐकण्यात मात्र दोनच आलेत) आणि तसेही वादग्रस्त विधाने आणि भालचंद्र नेमाडे हे समीकरण आता काही नवं नसल्याने त्याविषयी न बोललेलच बरं! कदाचित त्यामुळेच नेमाडेंवर जातीयवादी साहित्यिक, किँवा अचानक माध्यमांमध्ये प्रसिद्धीद्वारे वाचकांच्या प्रकाशझोतात येण्यासाठी नेमाडे संधी मिळेल तिथे वादग्रस्त विधाने करण्याची संधी कधी सोडत नाही असा त्यांच्यावर बहुतेकदा ठपका ठेवला जातो. अर्थातच वरील समज माझा वैयक्तिक नसून परवा आंतरजालवर वाचलेल्या त्यांच्याविरोधात टेक्नोसॅव्ही (Technosavy) वाचकांच्या प्रतिक्रिया आहेत.

मला मात्र असे वाटत नाही. मला वाटतं की भालचंद्रजी नेमाडे जाणूनबुजून नवा वाद जन्माला घालत नाही. ते चांगल्या उद्देशानं काही चांगलंच बोलायला जातात पण त्यांच्या वाणीतून जे निघतं त्याची एक बाजू (शब्दश: अर्थाची) वादग्रस्त असते; जिला माध्यमे प्रसारीत करून प्रकाशझोतात आणतात मात्र त्यांच्या वक्तव्याची दुसरी बाजू (ते जे समाजहिताचं बोलू ईच्छितात ते) प्रसारमाध्यमांद्वारे प्रसारीत होणाऱ्या एका बाजूच्या आक्रोशाच्या आवेशात दबून तिथेच विरळून जाते. नेमाडे जे म्हणू ईच्छितात ते प्रसारमाध्यमे सहसा दाखवत नाही आणि दाखवली तरी प्रकाशझोतात येईल अशा पद्धतीने नाही; आणि दाखवणारही कशाला . . . खरी टीआरपी (TRP) त्यांच्या वादात जी असते!!
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भालचंद्रजी नेमाडे यांनी या समारंभात दोन वादग्रस्त विधाने केली ती पुढीलप्रमाणे-

  1. "साहित्य संमेलन हा रिकामटेकड्या लोकांचा उद्योग आहे. साहित्य संमेलन बंद व्हायला हवेत."
  2. "मराठी भाषेचे जतन आणि संवर्धन करण्यासाठी मातृभाषा नीट आलीच पाहिजे. एवढेच नव्हे तर, आपल्याला स्वप्न सुद्धा मराठीत पडली पाहिजेत. आधी घरात मराठी ठीक करा. शेतकऱ्यांची मुले मुख्यमंत्री होतात, पण मराठीसाठी काय करतात? कनार्टकात नाही चालत असे. मग, महाराष्ट्रात मराठीपेक्षा इंग्रजीला प्राधान्य का?" असा सवाल करीत नेमाडे यांनी "इंग्रजी शाळा बंद कराव्यात," असे मत व्यक्त केले होते.

पूर्वी कै. ना. सी. फडके यांनीही, "साहित्य संमेलन म्हणजे तमाशाचा जलसा" असा त्याचा उल्लेख केला होता पण वेळ आली तेव्हा त्याच साहित्य संमेलनाचे अध्यक्षपद स्वीकारण्यामध्ये त्यांना काहीही संकोच वाटला नाही असे कै. आचार्य अत्रे यांनी लिहून ठेवले आहे. त्यामुळे नेमाडेंच्या या वक्तव्याविषयी मी ईथे काही भाष्य करणार नाही.

पण मला त्यांच्या "इंग्रजी शाळा बंद कराव्यात," या वक्तव्यावर आपली प्रतिक्रिया नोंदवाविशी वाटते. तशी पाहता पुढील प्रतिक्रीयेतील काही संदर्भ मी नेरवाच माझ्या ट्विटर वर व्यक्त केला होता मात्र मला वाटतं या विषयावर स्वतंत्र अनुदिनी लिहूनच मत प्रकटीकरण योग्य व सोईस्कर ठरेल.

मला वाटतं की "इंग्रजी शाळा बंद करण्यापेक्षा नव्या इंग्रजी शाळांना परवानगी नाकारुन शासनाने बेकायदेशीर इंग्रजी शाळांची मान्यता रद्द करायला हवी. मला वाटतं इंग्रजी माध्यमाच्या खाजगी शाळातून दिलं जाणारं दर्जेदार शिक्षण प्रशिक्षित शिक्षकांद्वारे शासकीय शाळातूनही नक्कीच दिला जाऊ शकतो."

आजकाल इंग्रजी माध्यमाच्या खाजगी 'सीबीएसई' शाळांची शहरात तर आहेच पण खेड्यांमध्येही अगदी ऊत (खैरात) पिकल्यासारखी परिस्थिती आहे. काही राजकीय नेतेमंडळी व फक्त पैशाने श्रीमंत ज्यांची पोहोच वर पर्यँत आहे असे संस्थाचालक जागोजागी इंग्रजी माध्यमाच्या शाळा उघडतात. महाराष्ट्रात पुर्वीच्याच भरपूर इंग्रजी शाळा असताना शासन अशा नव्या शाळांच्या प्रस्तावांना कशी काय मंजूरी/मान्यता देते हा खरा न उमगण्यासारखा प्रश्न आहे, नाही तरी मान्यता नाही मिळाली अथवा रद्द झाली तरी संस्थाचालक शाळा बंद करतात कुठे?? माझ्या माहितीतील बहुतेक शाळांचे संस्थाचालक स्वयंअर्थसहाय्यित तत्त्वावर शासनाकडून मान्यता प्रमाणपत्र आणून शाळा चालवतात. खेड्याच्या ठिकाणी शाळा उघडणाऱ्या संस्थाचालकांची तर विद्यार्थ्यांच्या प्रवेशासाठी पालकांना आकर्षित करण्यासाठी एक मस्त डायलॉग असते- "आम्ही शहराच्या तोडीच्या इंग्रजी शिक्षणाची संधी अत्यल्प शुल्कात ग्रामीण क्षेत्रातील विद्यार्थ्याँना देण्यासाठी खेडेगावी शाळा उघडल्यात. आमच्या शाळेतील शिक्षकांचा समूह हा शहराच्या ठिकाणाहून आहे. आमच्या शाळेचा विद्यार्थ्याचा सर्वाँगीण विकास हाच ध्यास आहे. उत्तम वाहतुक व्यवस्था आहे वगैरे... वगैरे..."

भोळे पालक सुद्धा बंद डोळ्यांनी संस्थाचालकांच्या आश्वासनांवर विश्वास ठेवून क्षणात अशा खाजगी इंग्रजी शाळांकडे आकर्षित होऊन आपल्या पाल्याला पण फक्त इंग्रजी शिक्षण मिळेल या भाबड्या आशेने अशा शाळांमध्ये प्रवेश करवून घेतात. माझा प्रश्न आहे की पालकांना दिलेली किती आश्वासने किती संस्थाचालक पुर्ण करतात. माझ्या तर निदर्शनात असे संस्थाचालक आढळले नाहीत आणि असतीलही तर अगदी बोटावर मोजण्याइतके... एकदा प्रवेश झाला कि शाळांची परिस्थिती जैसे थे!

वाहतुकीसाठी किती शाळांची 'स्कूल बस' ही शासनाने 'स्कूल बस' साठी आखून दिलेल्या नियमांचे पालन करते? बहुतेक शाळांच्या बसचा तर प्रमुख ओळख असलेला 'पिवळा' रंगच पिवळा नसून 'पांढरा' असतो! एका विद्यार्थ्याच्या जागेवर तीन-तीन विद्यार्थी बसवले जातात. स्कूल व्हॅन मध्ये विद्यार्थ्याँसोबत एक शिक्षक ठेवण्याचा नियम असताना शाळेच्या व्हॅन मध्ये प्रवास करणाऱ्या शिक्षकांना संस्थाचालकांद्वारे मानसिक त्रास दिला जातो (ते शक्यही कसं होईल म्हणा जेथे विद्यार्थ्यांसाठीच सोयीस्कर जागा नसेल तिथे). आणि (माझ्यासारख्या) एखाद्या प्रामाणिक प्राचार्याने नियमाचा आधार घेत शिक्षकांची बाजू घेतल्यास विरोध केला जातो (अर्थातच ही भुतकाळात घडलेली सत्यता आहे). मला हा ही प्रश्न पडतो कि पांढऱ्या रंगाच्या 'स्कूल व्हॅन्स' ना परवानगी नसतानाही रोडवर जागोजागी धावताना आढळत असताना वाहतूक पोलिस (RTO) च्या लक्षात कशी काय येत नाही, आणि आली तरी संबंधित शाळा व संस्थाचालकांविरुद्ध कारवाई का केली जात नाही. की वाहतुक पोलिस सुद्धा आपले खिसे गरम करून अशा निवडक संस्थाचालकांच्या काळ्या कारनाम्यात साथ देऊन स्वत:हून भ्रष्ट होऊ ईच्छितात?? ज्यांच्या खांद्यावर सुरळीत वाहतुकीची जवाबदारी आहे असे भारतातील कर्तव्यदक्ष वाहतूक पोलिसच जर अशा संस्थाचालकांवर कारवाई करणार नसतील तर ईश्वर न करो पण भविष्यात अशा स्कूल व्हॅन एखाद्या घटनेत दुर्घटनाग्रस्त झाल्यास त्याला जवाबदार कोण राहील??

शाळेचे प्रवेश शुल्क इतर शाळांच्या तुलनेत थोडे कमी ठेवून शाळेच्या गणवेष व पाठ्यपुस्तक विक्रीमध्ये देखील पालकांची शाळेकडून लूटच केली जाते की! परत पुढल्या वर्षीही परिस्थिती जैसे थे! अच्छा! एखादा पालक पाल्याची शाळा बदली प्रमाणपत्र (TC) घेण्याकरिता शाळेत गेल्यास पालकाला ते देण्यात टाळाटाळ केली जाते. आणि तयार झालेच तर संपुर्ण वर्षाचे शाळा प्रवेश शुल्क भरण्यास सांगीतले जाते. हा विनाकारणचा आर्थिक व मानसिक त्रास नाही का?

हे सर्व घडत असताना या सर्व स्वयंअर्थसहाय्यित खाजगी इंग्रजी शाळा ज्या शासकीय अधिकाऱ्यांच्या अधिपत्याखाली येतात ते शिक्षण खात्यातील अधिकारी काय करत असतात हा खरा संशोधनाचा विषय आहे.

बरं! शासनाने शाळांमधील शिक्षक भरती संदर्भातही काही नियम आखून दिलेले आहेत. कोणत्याही शाळेत कार्यरत शिक्षक व्यावसायिक पात्रता (D.Ed./DTEd/B.Ed) धारक असणे बंधनकारक असून त्यासोबतच आता सीबीएसई शाळांमध्ये केँद्रशासनाची Central Teachers Eligibility Test (केँद्रीय शिक्षक पात्रता चाचणी- CTET) आणि राज्य शासनाच्या शाळात संबंधित राज्याची TET परीक्षा (महाराष्ट्रात MahaTET) उत्तीर्ण उमेदवार असणे अनिवार्य आहे. परंतू खाजगी शाळांमधील किती शिक्षक किँबहूना किमान व्यावसायिक पात्रताधारक (D.Ed./DTEd/B.Ed.) तरी असतात? ते तर जाऊ द्या पण जे पालक आपल्या पाल्याला इंग्रजी माध्यमाचे CBSE शिक्षण देऊ ईच्छितात त्या CBSE शाळांमधील शिक्षक तरी CBSE शिक्षणक्रमातून किमान 10वी, 12 वी तरी उत्तीर्ण असतात का? आणि इंग्रजी माध्यमाच्या खाजगी शाळेत शिकवणारे किती शिक्षक (LSRW-Listening, Speaking, Reading and Writing) या किमान 4 भाषिक कौशल्यात तरी निपूण असतात? अर्थात किती शिक्षकांना खरंच व्यवस्थित इंग्रजी बोलता, वाचता व लिहिता येते?

माझा 3 खाजगी इंग्रजी CBSE शाळांमध्ये माजी शिक्षक व एका स्वयंअर्थसहाय्यित इंग्रजी माध्यमाच्या CBSE शाळेत दोन महिने का होईना पण माजी प्राचार्य/मुख्याध्यापक म्हणून असा अनुभव आहे की तिथे बहुतेक शिक्षक राज्य शासनाचा अभ्यासक्रम शिक्षित (मी सुद्धा!) व ते ही व्यावसायिक पात्रता (DTEd, BEd) नसलेले अर्थात अप्रशिक्षित असतात. (मी DTEd उत्तीर्ण आहे) मग असे शिक्षक जे स्वत:सुद्धा राज्य शासनाचा अभ्यासक्रम शिकलेत ते ही अधिकतर मराठी किँवा निवडक सेमीइंग्रजी माध्यमाच्या शाळातून ते संपूर्ण इंग्रजी माध्यमातून CBSE चा अधिक काठिण्यपातळीचा अभ्यासक्रम विद्यार्थ्याँना कसा शिकवू शकतील? आणि त्यांनी शिकवलेला अभ्यासक्रम विद्यार्थ्याँना कसा समजेल याविषयीची वास्तविकता साधी कल्पना करूनही लक्षात येईल. अशा शिक्षकांच्या अध्यापनातील काही त्रुटीँची तक्रार घेऊन आल्यास संस्थापकांमार्फत पालकांना त्यांचीच चूक असल्याचे सांगून चुका करणाऱ्या शिक्षकांचा पक्ष घेतला जातो आणि जेव्हा एखादा प्रामाणिक व आपल्या कार्यात निपूण शिक्षक/मुख्याध्यापक संस्थापकांना वारंवार चुका करत असलेल्या शिक्षकांबद्दल सुचित करतात तेव्हा त्या प्रामाणिक/कौशल्यसंपन्न शिक्षकांनाच संस्थापकांचा मानसिक त्रास सहन करावा लागतो. अशावेळी खरी चुक कोणाची असते? अशा बाबतीत संस्थापकांना दोष देऊन भागणार नाही कारण खरे जर चुकत असतील तर ते म्हणजे भोळे पालक! होय पालकच! कारण अशा शाळांमधील शिक्षकांची शैक्षणिक व व्यावसायिक अर्हता तसे माध्यम माहिती असूनदेखील तेच तर आपल्या पाल्याला खोट्या आशेने अशा शाळेत पाठवतात. खरंतर ते शिक्षक ज्यांचा मी वर नकारार्थी उल्लेख केलाय ते प्रामाणिक प्रयत्न करतात मात्र जे स्वत: 12 वीपर्यँत राज्य शासनाचा अभ्यासक्रम शिकले त्यांच्याकडून मोठ्या चमत्काराची अपेक्षा बाळगणे हा शुद्ध मुर्खपणा नव्हे का??

बरं! याबरोबरच शासनाने प्राथमिक शाळांमधील शिक्षकांसाठी विशिष्ठ वेतनश्रेणी ठरवून दिलेली आहे. मी जाणतो की खाजगी शाळांमध्ये नोकरीसाठी काही वर्ष फुकटात काम करावे लागते. अन्यथा मग दहा-पंधरा-वीस लाख रुपये रोख किँवा टप्प्याटप्प्याने भरावे लागतात; त्यातही कोणी आपल्यापेक्षा जास्त देणारा उपलब्ध असल्यास आपला पत्ता कटून त्याची वर्णी लागते. मला पक्का मार्केट रेट माहीत नाही! कारण माझ्यासारख्या बऱ्याच डीटीएड धारक बेरोजगारांची तितकी ऐपत नाही व मला फक्त एक रुपयाही हरामाचा घेऊन कोणी कायमस्वरुपी नोकरी देत असेल तरी मला ती नोकरी नको आहे. कारण एकीकडे भ्रष्टाचाराच्या विरोधात 77 वर्षाचे ज्येष्ठ समाजसेवक श्री अण्णाजी हजारे उपोषणे व आंदोलने करत असताना माझ्यासारख्या त्याच 'हजारे' आडनावासह जन्माला आलेल्या तरुणानेच भ्रष्टाचाराला खतपाणी घालणारे कृत्य केल्यास ईश्वर मला कधी माफ करणार नाही. म्हणण्याचा अर्थ काय तर शिक्षण या पवित्र क्षेत्र व शिक्षकी या पवित्र व्यवसायाचे हे संस्थाचालक व काही राजकीय नेत्यांनी अगदी बाजारीकरण करून ठेवले आहे. तर असो!

पण स्वयंअर्थसहाय्यित तत्त्वावर मान्यताप्राप्त शाळेत नोकरीसाठी असे डोनेशन भरावे लागत नाही. नोकरीसाठी एक प्रभावशील अध्यापनाचं सादरीकरण (डेमो) पुरेसा असतो. सोबत उमेदवाराचे माहितीपत्रक. परंतू त्या माहितीपत्रकातील माहिती बरोबर आहे की नाही याचीही शहानिशा केली जात नाही. जर तुमचं अध्यापन कौशल्यपुर्ण नसेल परंतू संस्थाचालकांशी 'चांगली' ओळख अथवा 'जवळचे' नातेसंबंध असतील तर मग तर शैक्षणिक पात्रता साधा शिपाई होण्याचीही नसेल तरी शिक्षक म्हणून शाळेत रुजू होणे कठीण नाही. शैक्षणिक पात्रता व व्यावसायिक पात्रतेचा तर विचारच सोडा! आता विनाडोनेशन सुशिक्षित बेरोजगारांना नोकरी दिल्यावर संबंधित शिक्षकांना स्वयंअर्थसहाय्यित खाजगी इंग्रजी माध्यमाच्या शाळांमध्ये दिवसभर राब-राब राबवले जाते आणि मानधनाच्या नावावर शिक्षक व 'फक्त नावाच्या' मुख्याध्यापकांना पगाराच्या नावाखाली अगदी रु.1000 ते रु.6000 (मी खुप मोठा आकडा सांगतोय) असे नाममात्र भीक घातल्यासारखे मासिक मानधन दिले जाते. आणि बेरोजगारीला कंटाळून आमच्यासारखे सुशिक्षितही असे व्यवसाय खाली राहण्यापेक्षा बरं म्हणून असे काम स्विकारतातही हिच खरी शोकांतिका आहे; कारण यामुळेच तर अशा संस्थापकांना बळ मिळतं! (अर्थात काही खाजगी शाळांमध्येही शिक्षक-मुख्याध्यापकांना समाधानकारक वागणूक व मानधन दिलं जातं त्यासंबंधी माझा वाद नाही.) मी ही मान्य करतो की डोनेशन वगैरे भरलेला नसताना व शासकीय नोकरी नसलेल्या ठिकाणी अगदी पंधरा-वीस हजार रुपये मानधनाची अपेक्षा बाळगणे चुकीचे ठरेल मात्र शिक्षकी व्यवसायासाठी समाधानकारक मानधनाची अपेक्षा चुकीचीही तर नाही ना?? शेवटी संस्थापक मंडळी सुद्धा त्याच 'स्वयंअर्थसहाय्यित'च्या नावाने पालकांकडून अगडबंब शुल्क गोळा करतातच की!
माझा प्रश्न आहे की शासन स्वयंअर्थसहाय्यित शाळांना मान्यता देताना शिक्षक व शिक्षकेतर कर्मचाऱ्यांना दिल्या जाणाऱ्या वेतनश्रेणीसंबंधी काही नियम आखून देत नाही का? आणि जर शासनामार्फत असे नियम आखून दिले जात असतील तर अशा शाळांमधील शिक्षक खरंच अध्यापनकार्यासाठी निर्धारित किमान शैक्षणिक व व्यावसायिक पात्रता धारण करतात का? ते करत असतील तर त्यांना निर्धारित वेतनश्रेणीतील वेतन/मानधन नियमित दिलं जातं का? याबाबत चौकशी/शहानिशा व खात्री करुन घेण्याची जवाबदारी कुणाची? ती प्रशासनात कार्यरत शैक्षणिक खात्यातील अधिकाऱ्यांची जवाबदारी नाही का? आणि जर आहे तर ती जवाबदारी प्रशासकीय अधिकारी निष्ठेने पार पाडतात काय? माझा प्रशासनाविरुद्ध रोष यत्किँचितही नसून प्रशासनाच्या उदासिन व सर्व काही ज्ञात असून पैसे खाऊन यासंबंधी 'माहितच नसल्याचा' आव आणून गप्प बसलेल्या निवडक प्रशासकीय यंत्रणेबद्दलचा हा संताप आहे.

म्हणूनच मला मनापासून वाटतं की नव्या खाजगी शाळांच्या प्रस्तावांना मंजूरी देण्यापेक्षा जून्या शासकीय मराठी शाळांतूनच किँवा नव्या 'शासकीय' इंग्रजी शाळा उघडून इंग्रजी माध्यमातूनही CBSE च्या पण शिक्षणाची सोय उपलब्ध करुन देता येऊ शकतेच की! काय हे शक्य नाही का? असे केल्याने बऱ्याच गोष्टी एकत्रितपणे साधता येतील-

असे झाल्यास सध्या खाजगी इंग्रजी माध्यमाच्या शाळांकडे वाढता विद्यार्थ्यांप्रतीचा पालकांचा कल पुनश्च शासकीय शाळांकडे वळेल.
साहजिकच जेथे आज शासकीय प्राथमिक शाळांमधील शिक्षकांना शैक्षणिक वर्षाच्या प्रारंभी भर ऊन्हात 6-14 (विशेषत: 6) वर्षे वयोगटातील विद्यार्थ्यांच्या शोधात (विशेषत: इ. 1ली च्या) प्रवेशासाठी भटकावे लागते तेथे पालकवर्ग स्वत:हून पाल्याचा प्रवेश शासकीय शाळांमध्ये करतील. परिहार्याने आपोआप शासकीय शाळांमधील विद्यार्थीसंख्या वाढेल.
विद्यार्थीसंख्या वाढल्याने साहजिकच अधिक शिक्षकांची गरज भासेल. जेथे आज नोकरीतील शिक्षकच अतीरिक्त ठरत असल्याने समायोजन करण्याची गरज आहे असे तत्कालीन महाराष्ट्र शासनामार्फत सांगीतले जात होते, त्याच शासकीय शाळांमध्ये कित्येक मागील 4 वर्षापासून न झालेली शिक्षक भरतीची परिस्थिती बदलून प्राथमिक शाळांमध्ये नव्या शिक्षकांची गरज भासेल.
आमच्यासारख्या सुशिक्षित डीटीएड/बीएड धारक सुशिक्षित बेरोजगारांना शासकीय, खाजगी किँवा कंत्राटी तत्त्वावर नोकरीत सामावून घेत समाधानकारक मानधन देऊन बेरोजगारमुक्त करता येईल.
सर्वात महत्त्वाचं म्हणजे खरंच इंग्रजी माध्यमातून आपल्या पाल्यांना शिकवू ईच्छिणाऱ्या पालकांच्या पाल्यांना खरोखर प्रशिक्षित शिक्षकांमार्फत शिक्षणाचा लाभ घेता येईल.

आपण जर मला विचारलं की मराठी शाळांच्या अशा केवीलवाण्या परिस्थित जवाबदार कोण आहे तर मी म्हणेन चतुर्थ पासून तर प्रथम श्रेणीचे शासकीय कर्मचारी आणि उच्चपदस्थ अधिकारी. होय! मग ते शिपाई/शिक्षक कर्मचारी असोत किँवा पोलिस अधिक्षक वा माननीय जिल्हाधिकारी! होय हे शासकीय कर्मचारी/अधिकारी सुद्धा तितकेच मराठी शाळांच्या दुरावस्थेला कारणीभूत आहेत. कसे? कसे ते मला विचारण्यापेक्षा जर आपण वरील नमूद केलेल्यांपैकी कोणीही असाल अथवा नसाल तरी... जर आपले पाल्य प्राथमिक शिक्षण घेत असतील तर स्वत:ला विचारा कि ते शिकत असलेली शाळा कोणती? अहो दातओठ काय चावताय मी सांगतो- आपल्यापैकी बहुतेकांचे उत्तर हे खाजगी शाळा असेच असेल.. मला वाटतं मी बरोबर आहे. कारण आम्ही शासनाकडून वेतन तर घेतो पण जेव्हा आपल्या मुलांच्या प्राथमिक प्रवेशाची वेळ येते तेव्हा त्यांना खाजगी शाळेत दाखल करुन घेतो. आम्ही शासकीय प्राथमिक शिक्षक काय करतो तर शैक्षणिक सत्राच्या प्रारंभी विद्यार्थी प्रवेशासाठी घरोघरी भेटी देतो परंतु आपल्या पाल्यांना मात्र खाजगी शाळेत पाठवतो. का? कारण आमच्याकडे पैसा आहे. आणि हा पैसा कुठून आला? तर शासकीय नोकरी करून. परंतू त्याच शासकीय शाळांच्या दयनीय परिस्थितीची जाणीव असूनदेखील ती परिस्थीती सुधारण्यासाठी आमचे शासकीय कर्मचारी/अधिकारी म्हणून योगदान काय? तर शून्य! का? आमचे ही मराठी शाळांची दयनीय परिस्थिती बदलून सुजलाम् सुफलाम् करणे हे कर्तव्य वा उत्तरदायित्व नाही का?

तसं पाहता आता मी जी मागणी करतोय ती बरेच जणांनीही यापुर्वी केलेली आहेच. किँबहूना आजच फेसबुक या सामाजिक संकेतस्थावर 'मराठी कविता समूह' या गृपच्या भिँतीवर (वॉल) कुण्या भाविना राउत नावाच्या तरुणीनं हेच विचार हिंदीतून व्यक्त केलेले वाचलेत.

राज्य व केँद्र शासनाने असा कायदाच करायला हवा की शासकीय नोकरी करणाऱ्या कनिष्ठापासून वरिष्ठांपर्यँत सर्व श्रेणीचे कर्मचारी (मग ते शिपाई, लिपिक, असोत की जिल्हाधिकाऱ्यांसारखे उच्चपदस्थ अधिकारी) सर्वाँनी आपल्या 6 ते 14 वयोगटातील पाल्यांना सरकारी शाळेतच किमान प्राथमिक शिक्षण (इयत्ता पहिली ते आठवी) पुर्ण होईपर्यँत दाखल करुन घ्यावे. आणि जे कर्मचारी व/वा अधिकारी या कायद्याचे पालन करणार नाही अशा कर्मचारी व/वा अधिकाऱ्यांनी त्वरीत आपल्या शासकीय नोकरीच्या पदावरून राजीनामा द्यावा अथवा तसे न केल्याच्या शासनाच्या निदर्शनास आल्यास अशा कर्मचारी/अधिकाऱ्यांना अनुक्रमे अधिकारी/शासनाने शासकीय सेवेतून निलंबित करावे. (किँबहूना तशी तरतूद त्या कायद्यातच असावी.)
आता आपण म्हणाल की हे जरा अतीच होतय. पण हे अती नसून योग्यच आहे. कारण पुर्वीतरी कोठे होत्या अशा गावोगावी इंग्रजी शाळा? तरी तुमचं-आमचं शिक्षण योग्यरितीने झालच ना! ज्या मराठी माध्यमाच्या शासकीय शाळांना आज आम्ही कमी लेखतो त्याच मराठी शाळांमधून प्राथमिक शिक्षण घेऊनही पोहोचलातच ना आपण तितक्या मोठ्या पदावर! घातलीच ना तुम्ही तितत्या मोठ्या पदाला गवसणी? आपणास तर मराठी शाळेतील शिक्षण कधी यशाच्या आड अडथळा म्हणून आलं असेल असं मला तरी वाटत नाही. जे माध्यम व शाळा आपल्या यशाच्या मध्ये आड आले नाहीत त्याच माध्यम व शाळांना मग आपल्या पाल्याच्या शिक्षणाच्या वेळी इतकं हीन दर्जाचं कसं काय समजू शकतो? म्हणूनच मला मनापासून वाटतं की शासकीय कर्मचारी व/वा अधिकाऱ्यांनी आपल्या पाल्यांना शासकीय मराठी शाळांतच टाकावं असा कायदा बनायला हवा कारण आज त्याची नित्तांत आवश्यकता आहे. आणि समजा जर असा कायदा आला नाही तरी सर्व शासकीय कर्मचाऱ्यांनी आपली नैतिक जवाबदारी समजून आपल्या पाल्यांना शासकीय मराठी शाळातच दाखल करायला हवे.
आता आपण म्हणाल की तेव्हाची परिस्थिती वेगळी होती. तेव्हाचा काळ वेगळा होता. आर्थिक परिस्थिती हलाखीची होती. स्पर्धा नव्हती. आम्हाला अशी संधी नव्हती. तरी तुमचं भागलंच ना? आणि आता तुमची आर्थिक परिस्थिती बदलवून देणारी शाळा कोणती? तेव्हा मराठी शाळांना खरंतर पर्यायच नव्हता. आणि आज पर्याय झालेल्या इंग्रजी शाळांमध्ये राज्याची मातृभाषा मराठीची अवस्था काय आहे. तर तिथे एक मराठी विषय शिकवला जातो तोही अनिवार्य आहे म्हणून! त्या मराठी विषयाला पण इतका सोपा समजला जातो कि तो विषय कोणीही शिक्षक शिकवून घेईल. इतर विषयांप्रमाणे मराठीवर प्रभुत्वसंपन्न शिक्षकाची स्वतंत्र नेमणूक केलेली मी आजवर एकाही खाजगी इंग्रजी शाळेत पाहिलेली नाही. इतकच काय तर मी तर काही शाळांमध्ये हा ही अनुभव घेतलाय की तिथे मराठीच्या तासिकेव्यतीरिक्त शिक्षकांनी आपापसात मराठीतून वार्तालाप करणे सुद्धा वर्ज्य असते. (काही शाळेत तर हे दंडनीय आहे!) इंग्रजी शाळांमध्ये इंग्रजीचा प्रसार मी ही समजू शकतो मात्र राज्याची मातृभाषा मराठीची याच महाराष्ट्रात हेटाळणी व तिरस्कार कशासाठी? आज अशा मराठी शाळांना इंग्रजी शाळेचा पर्याय असल्यामुळेच मराठी भाषेची इतकी दयनीय अवस्था झाली. आणि म्हणूनच मराठीची अशी केवीलवाणी अवस्था पाहून भालचंद्र नेमाडे यांच्यासारख्या ज्येष्ठ साहित्यिकाने आक्रोशातून "इंग्रजी शाळा बंद करा" असे विधान केले तर त्यांचं चुकलं तरी कोठे?? अर्थातच त्यांचा रोष इंग्रजी भाषेवर नसून इंग्रजी शाळांवर होता. नेमाडेँनी 'इंग्रजी शाळा बंद' करण्याची मागणी केली पण 'इंग्रजी बंद' करण्याची नाही हेही माध्यमांनी त्यांच्या विधानावर चर्चा करत असताना परिसंवादात लक्षात घ्यायला हवे.
मी आपल्या म्हणण्याशी पुर्णपणे सहमत आहे. मी जाणतो की सध्या शासकीय मराठी शाळांचीही परिस्थिती काही खुप चांगली नाही. होय सध्या काही शासकीय शिक्षक आपल्या कर्तव्याप्रती उदासीन असतीलही पण सर्व शिक्षकांना दोष देऊन चालणार नाही कारण चांगले व आपल्या कर्तव्याप्रती प्रामाणिक शिक्षक देखील समाजात आहेत. आणि निवडक शिक्षकांच्या उदासिनतेला हे ही एक कारण आहे की आजचे पालकच शासकीय शाळांप्रती उदासीन आहेत.
आपणास कदाचित वाटत असेल की मी स्वत:चा उल्लेख वर माजी शिक्षक व प्राचार्य असा केल्याने ज्येष्ठ व्यक्ती अथवा येथे इंग्रजी भाषा, खाजगी इंग्रजी शाळा, संस्थापक, प्रशासन व शासनाच्या विरुद्ध जरा तिखट भाषेत लिहिल्यामुळे या सर्वाँचा खुप मोठा विरोधक आहे वगैरे--- तर जरा थांबा! आपण ईथे गैरसमज करून घेताय. माझा कोणत्याही शाळा, संस्थापक, शिक्षक, अथवा शासन, प्रशासन वा तेथील अधिकारी/राजकीय नेत्याला वैयक्तिक विरोध नाही. तरी जर कोणाच्या भावना माझ्या लिखाणामुळे दुखावल्या असतील तर दुरूनच व विरोधात्मक प्रतिक्रिया येण्यापुर्वीच मी क्षमाही मागतो. मात्र आपण वस्तुस्थितीकडे दुर्लक्ष करु शकत नाही. मी कोणी पत्रकार वा खुप मोठा विचारवंत सुद्धा नाही. या लेखाला नेमाडेंचे विधान हेच एक निमित्त आहे एवढेच!
इंग्रजी भाषेला माझाही शंका घेण्याईतपतसुद्धा विरोध नाही. किँबहूना तो कसा काय असू शकेल. कारण या लेखात मी स्वत: जरी इंग्रजी शाळांवर टिप्पणी केलेली असली तरी माझा स्वत:चासुद्धा सर्वात आवडता अभ्यासक्रमीय विषय 'इंग्रजी'च आहे तो ही इयत्ता. दुसरीपासून.
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मी स्वत: फक्त 22वर्षीय अविवाहित तरुण आहे. माझं स्वत:चं बालवाडीपासून तर दहावी पर्यँतचं शिक्षण संपुर्णत: मराठी माध्यमातुन झालं. त्यातही इयत्ता सातवी पर्यँत शासनाच्या अनुक्रमे गोँदिया (तत्कालीन भंडारा) (इ.1-2री ½), जालना (इ. 2री ½-इ. 3री ½), गोँदिया (इ. 3री ½- इ. 6वी) व परत जालना (इ. 7वी) असे जिल्हा परिषद (तत्कालीन भंडारा व आताच्या गोँदिया) तील तिरोडा पं.स. अंतर्गत जि.प. पुर्व माध्यमिक शाळा इंदोरा खुर्द (निमगाव) व जिल्हा परिषद जालना तील अंबड पं.स. अंतर्गत जि.प. प्राथमिक शाळा दोदडगाव येथे शिकलो. मला जिल्हा परिषदेच्या मराठी शाळात शिक्षण घेतल्याचा अभीमान आहे व मला तरी मी कोठे किँबहूना इंग्रजीतही (इंग्रजी शाळेतून शिक्षितांच्या तुलनेत) कमी आहे असं वाटत नाही. आज अविवाहित असतानाच मी हे ठामपणे सांगतोय की "उद्याचालून भविष्यात माझी ऐपत मुलांच्या शिक्षणावर कितीही खर्च करण्याची झाली वा मी भविष्यात साधा शिपाई झालो अथवा कलेक्टर जरी झालो तरी भविष्यात विवाहबद्ध झाल्यानंतर मी आपल्या मुलांना कदापिही इंग्रजी माध्यमांच्या कॉन्व्हेँट व पब्लिक स्कुल सारख्या खाजगी शाळेत टाकून त्यांची 'एक ना धड भाराभर चिँध्या' (ना व्यवस्थित इंग्रजी ना व्यवस्थित मराठी) अशी फसगत अवस्था करणार नाही. मला बिल्कूलही पर्वा नाही भविष्यात लोकं काय म्हणतील त्याची! मी हे फक्त म्हणून/लिहून दाखवत नसून भविष्यात कृतीत उतरवणार आहे." (अन्यथा असं न केल्यास तुम्हीच या ना हा लेख घेऊन माझ्याकडे!) म्हणूनच मला मनापासून वाटतं की प्रत्येकच शासकीय कर्मचाऱ्याने आणि अधिकाऱ्याने आपल्या पाल्याला शासकीय शाळेत दाखल करायला हवं!

जर उच्चपदस्थ अधिकाऱ्यांची मुले शासकीय शाळांमध्ये शिकतील तर साहजिकच अध्यापनासंबंधी उदासीन व अकर्तव्यदक्ष शिक्षक सजगतेने प्रामाणिकपणे ज्ञानदानाचे कार्य करु लागतील. जेव्हा शासकीय कर्मचारी व अधिकारी आपल्या मुलांना शासकीय शाळेत दाखल करतील तेव्हा सामान्य जनता साहजिक त्यांच्या कृतीने प्रभावित होऊन आपली मुले पण शासकीय शाळेतच दाखल करतील.

थोडक्यात काय तर शासनाच्या अशा एका कायद्यामुळे शासकीय शाळांकडे बघण्याचा विद्यार्थी, शिक्षक, पालक व समाजाचा दृष्टिकोण ही सुधारेल व शासकीय शाळांना खऱ्या अर्थाने पुनर्संजीवनी लाभून आदर्श नागरीक निर्मितीच्या मोलाच्या कार्यात सतत अग्रेसर राहता येईल. अर्थात हे सर्व होऊ शकतं पण फक्त आणि फक्त राज्य व केँद्र शासनाने ठरवलं तर! आणि म्हणूनच मला वाटतं की मराठी भाषेच्या हितार्थ ज्येष्ठ साहित्यिक श्री भालचंद्र नेमाडे यांच्या शब्दांकडे लक्ष न देता त्यांचा उद्देश समजून घेऊन त्यांच्या वक्तव्याचा महाराष्ट्रात आदर व्हायला हवा.



  • टिप:- ईथे शासकीय चा अर्थ फक्त सरकारी नसून शासनाच्या नियंत्रणाखालील सर्व शैक्षणिक शाळा व शैक्षणिक संस्था असा अर्थ अभिप्रेत आहे.
  • ताजा कलम:- हा लेख 30 नोव्हेँबर व 01 डिसेँबर 2014 रोजी लिहिलेला आहे.


-राजेश डी. हजारे (RDH)

भ्रमणध्वनी- 07588887401, 07744018492
ईमेल- www.rdh@gmail.com
(लेखक 'अखिल भारतीय मराठी साहित्य परिषद, पुणे' च्या गोँदिया जिल्हा शाखेचे जिल्हाध्यक्ष आहेत.)

Wednesday, 8 January 2014

Gandhi Jayanti va Fatakemukta Diwali Vishesh

टिप- हेच पत्र सुरुवातीपासून वाचण्यासाठी येथे क्लिक करा

आजही सगळीकडे दिवे, पणत्या लागल्यात.. अंधारावर प्रकाशाचा अर्थात दुष्टावर सत्य व देवाचा विजय म्हणून दिवे लावतात वाटते.. सर्वीकडे रोषणाईच रोषणाई असते.. दिवाळीला लहाणांपासून तर मोठ्यांपर्यंत फटाके फोडतात.. मस्त आतिषबाजी होते.. Rohit-Sharma-209-runs-in-ODI.jpg
रोहित शर्मानं तर परवाच फटाके फोडले बघ बॅटने विश्वविक्रमी 16 षटकार मारुन 209 धावा बनवत ऑस्ट्रेलियाविरुद्धच्या एकदिवसीय क्रिकेट सामन्यात बंगळुरु मध्ये.. आणि भेट पण दिली आम्हा भारतीयांना सामना व मालिका विजयाची..
आम्ही पण फटाके फोडायचो लहानपणी.. पण आतासारखे विचित्र प्रकरण नव्हते.. आता नवनवे वेगवेगळे फटाके आहेत.. दिवाळीला फटाके फोडायला माझा विरोध नाही.. या सणाला नाही तर केव्हा फोडणार फटाके..? पण मर्यादा पाहीजेच ना कुठेतरी.. माझे बाबुजी नेहमी म्हणतात.. "प्रत्येक गोष्टीला मर्यादा असावी. एखादी गोष्ट मर्यादेबाहेर गेली कि त्याला उपाय नसतो.. आणि परिणाम घातकच असतात नेहमी." आणि हल्ली फटाक्यांमुळे किती प्रकारचे प्रदूषण होते नाही.. ध्वनी प्रदूषण, वायु प्रदुषण.. काही संस्था व समाजसेवक पर्यावरणावर होणारे दुष्परिणाम टाळण्यासाठी इकोफ्रेँडली सण साजरे करण्याचा सल्ला देतात.. पण आम्हा सनातनी हिँदूंना वाटतं असं आमच्याच सणाच्या वेळी का? मी विरोध होतानाचे बरीच उदाहरणे जवळून बघितलीत.. तर मला वाटतं कि आपण असा विचार करण्यापेक्षा आपल्यापासूनच का सुरुवात करु नये इकोफ्रेँडली सण साजरा करण्यास.. ते चुकीचं तर नाही ना.. पर्यावरण सुरक्षा तर चांगलीच बाब आहे.. मग का 'पहल' करु नये आपल्यापासूनच.. म्हणून मी स्वत:बद्दल सांगू ईच्छितो कि मी तीन वर्षाँपासून रंगपंचमीला रंग उधळत नाही व हे तिसरे वर्ष आहे दिवाळीला फटाके फोडत नाही.. मी जाणतो कि माझ्या एकट्यामुळे काहि पर्यावरणाचे खुप मोठे रक्षण होणार नाही.. पण माझ्यामुळे जे प्रदुषण होणार होते ते मात्र मी नक्कीच टाळू शकतो.. यामुळे खुप काही साध्य होणार नसले तरी त्यातून मिळणारा आत्मिक समाधान आहे तो मी वर्णन करु शकत नाही.. आणि माझ्यामुळे प्रेरीत होऊन वर्षाला एक जरी व्यक्ती माझे अनुकरण करु लागला तरी माझ्यासाठी खुप आहे.. तर काय कराल साजरी फक्त एक वर्ष फटाकेमुक्त दिवाळी.."

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"शेवटी दिपावली व नुतन वर्षाच्या आपण सर्वाँना हार्दीक शुभेच्छा..!!"

आणि हो साक्षात आज 8 जानेवारी 2014.. 2013 वर्षाच्या शेवटचा आठवड्यात 27 डिसेँबर जरा निराशाजनक गेला पण 29 डिसेँबर थोडा विशेष होता.. त्यादिवशी 'अनाथांची माई' म्हणून परिचित ज्येष्ठ समाजसेविका सौ. सिँधुताई सपकाळ यांच्याशी भेट जी झाली.. 1517683_516255598490347_1182537977_n.jpg1512444_516255601823680_1744579024_n.jpg1525668_453472721419558_966376816_n.jpg544596_517471025035471_2041389027_n.jpg
2013 ची अखेर जरा बरी झाली.. नविन वर्ष 2013ची सुरुवातही छान झाली... कालच सासवड जि. पुणे येथे 3,4 व 5 जानेवारीला भरलेल्या '87व्या अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलन-2014' च्या निमित्ताने पुणे येथून परतलो.. त्यासंदर्भात सविस्तर लिहिनच म्हणा.. 1522148_519591581490082_1990800156_n.jpg तर पाठव पत्र परवा मग मला तु पण.. चल भेटु पुन्हा.. बाय..

डायरी लेखक- राजेश डी. हजारे (RDH)

मुळ लेख- 03/10/2009, रामटेक
प्रथम प्रसिद्धी- 04/11/2013, फेसबुक
अद्ययावत लेखन- 03/01/2014 (शुक्रवार), MHADA/म्हाडा, सासवड जि. पुणे
पुनर्प्रसिद्धी- 08/01/2014 (मंगळवार), आमगाव

अणुक्रमणिका

Wednesday, 27 November 2013

TO THE LAST BULLET on 26-11 (#BookLysis)


  • दिवस ४३० वा
  • अनुदिनी ८२वी 
  • दुसरी पुस्तक समीक्षा

मित्रांनो सौ. विनीता अशोक कामटे व सौ. विनीता विश्वास देशमुख लिखित श्री भगवान दातार अनुवादीत "To The Last Bullet" (टु द लास्ट बुलेट) हे २६ /११ तील शहीद DIG IPS अशोक एम. कामटे यांचे जीवनचित्रण वाचून काढले.. हे पुस्तक वाचताना मला आलेले अनुभव थोडक्यात सांगावेसे वाटतात... 

Monday, 4 November 2013

'मानवता' - सर्वात मोठा धर्म

हाच लेख सुरुवातीपासून वाचा

मी एवढेच सांगू ईच्छितो कि हा लेख लिहिण्यामागे माझा उद्देश कोणत्याही धर्म वा धर्मीयांच्या धार्मिक भावना दुखावण्याचा मुळीच नाही.. तरी कुणाच्या धार्मिक भावनांना ठेस पोहचत असेल तर मी नम्रपणे आपली क्षमा मागतो.. हा लेख लिहिण्यामागे हेतु एवढाच आहे कि जे कोणी धर्मप्रेमी स्वधर्माचा प्रचार करत असताना जाणून बूजून इतर धर्माँचा कमीपणा दाखवत त्या धर्मातील जनतेच्या धार्मिक भावना दुखावणारे कृत्य करतात ईश्वर/अल्लाह त्यांना सद्बुद्धी देवो आणि त्यांचे 'तसले' कृत्य बंद होवोत... हा लेख वाचून एक जरी परधर्माचा कमीपणा लेखणारा व्यक्ती त्याधर्माचा सन्मान करु लागला तरी मी माझा हा इवलासा प्रयत्न सार्थक समजेन..

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मानवता

मी मानतो इमान ला
मी जाणतो इंसान ला
...
सर्वात पहला धर्म एकच
मानवता हे नाव त्याचं
हिँदू-मुस्लिम-शीख-ईसाई
बौद्ध जैन पारशी ही
का वाटता हो ईश्वराला?
...
एक होती ती धरती माता
भेद कधी ना केला होता
भारत-पाक-ईरान येथे
बंधुभावाने राहत होते
का वाटले हो पृथ्वीला?
...
मुस्लिम ताई मंदिरी ये ना
मी ही पाहिन मक्का-मदिना
'ईश्वर' म्हणा वा म्हणा 'अल्लाही'
तुम्ही वाचा 'भगवद्गीताई'
'आरडीएच' वाचतो 'कुरआन'ला
...
'रमजान' मध्ये 'राम' येतो
'दिवाळी'त 'अली' येतो रे
हिँदु-मुस्लिम-शीख-ईसाई
खरं सांगतो सर्व भ्राता रे
वाटू नका बस् मानवाला...


कवी- राजेश डी. हजारे ( RDH Sir)

कामठा रोड आमगाव ता. आमगाव जि. गोँदिया- 441902
भ्रमणध्वनी क्र.- 07588887401
('गोँदिया जिल्हाध्यक्ष-अखिल भारतीय मराठी साहित्य परिषद, पुणे')

'मानवता'-सर्वात मोठा धर्म

अनुदिनी 79 वी

दिवस 407 वा

मी खुप दिवसापासून बघतोय. फेसबूक सारख्या सोशल नेटवर्किँग वेबसाईट्स वर काही लोकांनी कोणत्याही एका धर्माच्या नावाने फेसबूक पेज किँवा प्रोफाईल बनवले आहेत आणि इतर धर्मांविषयी खोटेनाटे निराधार आरोप करणारे वक्तव्य आणि चित्रे अपलोड करून मित्रांना टॅग करतात. अशा कित्येक फेसबूक फोटो मलाही टॅग करण्यात आल्यात ज्यावर विचार केल्यानंतर मी काही लिहू व अशा नाटकी लोकांना विचारुही ईच्छितो.

आतापर्यँत असे जितकेही चित्रे मला फेसबूक वर पाठवण्यात आली त्यात फक्त 'ईस्लाम' ला लक्ष्य केले गेले आणि असे लज्जास्पद कृत्य करणारे माझे हिँदु भाऊ-बहिणीच आहेत हे कळल्यावर मलाच कसेतरी वाटते. हिँदू धर्माच्या पवित्र नावाने पेज तयार करुन ईस्लाम किँवा अन्य कोणत्याही एका धर्माला लक्ष्य करत त्यांच्या विषयी हे ना ते अनेक बिनबुडाचे आरोप व खोटेपणा समोर आणू पाहणारे आणि स्वत:ला 'स्वाभिमानी हिँदू' असे स्वघोषित बिरुद लावून घेणाऱ्या किँवा एका धर्माच्या नावाने अन्य धर्माँच्या तत्त्वांवर प्रश्नचिन्ह उपस्थित करणाऱ्या हिँदू धर्मीयांपैकी निवडक ढोँगी लोकांना मी काही विचारु ईच्छितो...

  • विश्वात काय फक्त दोनच धर्म आहेत?
  • काय फक्त 'ईस्लाम' च वाईट/खोटा/असत्यावर आधारित है?
  • काय फक्त 'ईस्लाम' च्याच तत्त्वात त्रूटी आहेत?
  • काय 'हिँदू' धर्मात कोणताच वाईटपणा/त्रूटी नाही?
  • काय फक्त अशा फोटो अपलोड करणाऱ्या व इतरांना टॅग करणाऱ्या फेसबूक पेजेसच्या संचालकांनाच हिँदू धर्माप्रती आदर व प्रेम आहे?
  • काय फक्त हिँदुंनाच स्वाभिमान आहे?
  • कोणी हिँदु धर्माविषयी 'तशी' पोस्ट अपलोड केल्यास काय माझे हिँदू भाऊ सहन करतील?
  • काय 'मुस्लिम' बंधू-भगिणीँना कसलाच स्वाभिमान नाही?
  • जर आपण आपल्या धर्मावर 'ईतका' प्रेम करतो तर बाकी धर्मीयांना आपल्या धर्माविषयी प्रेम/स्वाभिमान नसेल?

मी ही एक हिँदूच आहे. आम्ही पण आपल्या धर्मावर प्रेम करतो, आम्हालाही हिँदू असल्याचा स्वाभिमान आहे. पण याचा अर्थ असा होत नाही की तो दाखवण्या व व्यक्त करण्यासाठी इतर धर्मातील कमीपणा शोधून तो पसरवत त्या धर्माला बदनाम करत फिरावं. कारण मी जाणतो की आमच्यासारखाच अन्य सर्व धर्मांनाही स्वाभीमान आहे. आणि जेव्हा आम्ही स्वधर्माविषयी इतर धर्मियांकडून आदर-सन्मान अपेक्षित करतो तर त्यांच्या धर्माँचा सन्मान करणेही आपले कर्तव्य ठरते. आणि स्वत:ला अस्सल हिँदू म्हणवून घेणाऱ्यांना तर हे ही ज्ञात असायला हवं की इतर धर्मांचा सन्मान करण्यातच खरी शालीनता आहे.

मी असं मुळीच म्हणत नाही की या प्रकारचे पेजेस बनवू नका! कोणत्याही धर्माचा प्रचार करण्यासाठी हे अवश्य करायला पाहीजे! यासाठी भारतीय राज्यघटनेच्या Section 25-28 : Fundamental Right of Religion's Freedom मध्ये सर्व भारतीयांना धर्मस्वातंत्र्याचा (आवडीचा धर्म स्विकार,पालन व प्रचार करण्याचा) मुलभूत अधिकार दिला गेला आहे. म्हणून फेसबूक, ट्विटर सारख्या सोशल नेटवर्किँग/मायक्रोब्लॉगिँग संकेतस्थळांच्यामाध्यमाने अवश्य आपल्या धर्माचा प्रचार करायला हवा; पण आपणास हे ही लक्षात ठेवायला हवं कि ज्या संविधानाने आपणास हा धर्मस्वातंत्र्याचा मुलभूत अधिकार दिला त्यातच Section 15 नुसार धर्माविषयी भेदभाव करण्यास मनाई केलेली आहे आणि 'भारतीय दंड संहिता कलम 295-298' (Indian Penal Code Act 295-298) नुसार कोणत्याही माध्यमाने कोणत्याही धर्माचा अपमान वा धर्मियांच्या धार्मिक भावना दुखावणारे कार्य केल्यास त्याला दखलपात्र गंभीर गुन्हा स्विकारत 1 वर्ष कैद किँवा/आणि दंड होऊ शकतो.

वाचक मित्रांनो! होऊ शकतं... कित्येक लोक माझ्या या लेख शी सहमत होणार नाही किँवा मी हिँदू असून ईस्लाम चे समर्थन केल्याने माझ्या मताचा विरोध करतील. त्यांना मी एवढच सांगू ईच्छितो की मी ईस्लाम चेच नव्हे तर विश्वातील सर्वात पहिला धर्म 'मानवता' ची बाजू घेतोय... कारण मी माणतो की...

"सर्व धर्म समान आहेत. निसर्गात तर एकच धर्म आहे तो म्हणजे 'मानवता/ईँसानियत (Humanity)'! पण या धर्माचा याच मानवानं 'हिँदू, मुस्लिम, शिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी' असा बटवारा केला व एकाच ईश्वराला 'भगवान, अल्लाह, ईसा (येशु ख्रिस्त)' असा वाटून निसर्गनिर्मित एका धरतीचा 'भारत, पाक, ईरान' एका धर्मग्रंथाचे 'रामायण, महाभारत, कुरआन' तर एका धर्मस्थळाचे 'मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा' असा वर्गीकरण केला आहे." पण सर्वांचं रक्त एक आहे, शरीराची रचना एक आहे. मी विचारतो "जर त्या निसर्गानं भेद केला नाही तर मानवाला कूणी अधिकार दिला असा भेदभाव करण्याचा?"

मी तर मानतो की खरंतर 'हिँदू''मुस्लिम' धर्म एकच आहेत म्हणायलाही हरकत नसावी कारण विचार करण्यासारखी गोष्ट आहे की "मुस्लिम धर्मीयांच्या RAMzan-Eid या महत्त्वाच्या सणाची सुरुवात हिँदू धर्मीय प्रभू श्री RAM (राम) नावाने तर हिँदू धर्मीयांचा diwALI या सर्वात मोठ्या सणाचा शेवट मुस्लिम प्रेषित ALI (अली) च्या नावाने होतो. अर्थात रामाशिवाय 'रमजान ईद' व अली शिवाय 'दिवाली' हे सण सुद्धा अपूर्ण आहेत तर हिँदू शिवाय मुस्लिम व मुस्लिमांशिवाय हिँदू यांची कल्पना तरी कशी शक्य आहे..."

हाच लेख पुढे वाचा . . .

Thursday, 31 October 2013

मृतात्म्यास पत्र

दिवस ==> 403 वा

अनुदिनी ==> 77 वी

सदर पत्र 'झाडीबोली'त पाठवत आहे...

मृतात्म्यास पत्र

Image Source: India Today
प्रतिमा स्त्रोत: India Today

स्वर्गीय मेल्या माणसाच्या आत्म्यास,
तो 29 सप्टेँबर चा दिवस होता.. मी बाजंवर झोपला होतू.. सकारी सकारी माज्या आईना उटवलन.. जवरपास आठक वाजले असतील.. हव तुमी बराबर वाचून रायल्या.. मी एवढ्यावरच उटता कदी कदी.. झोपता बी जरा लेटच.. मोटी दाळ आदत आहे माले पर का करता? तं जाऊ द्या.. मले सांगतलन का आमगावमंदी कोणाचा तरी खून झाला.. माझे बाबूजी त्या जागेवर जाऊन वापस आल्ते.. भल्तीच गर्दी होती तं त्यायले पावाले नायी भेटला खरा..! मंग मी निँग्लू चड्ड्यावरच.. तुले पावाले.. कोण असल? कसा असल? कायले मारला असतील? कोणा मारला असतील? मनात लगीस्से परस्न येत होते.. आखीरकार पोचलूच त्या जागेवर... आमच्या घरापासना ज्यादा दूर नवता.. तू त्या नवीन बनत्या घरातच अंदर निपचित पडला अससील.. असे तं तू जिता अससील तई कोनी नसल विचारलंन तूले पर तूह्या मेल्यावर खासकरून तूजा मडर झाल्ता मून स्यानी सप्पायसाठी तूजी डेटबॉडी मनजे मोट्या हिरोसारकीच झाली होती.. गर्दीच गर्दी लोकायची.. पोरायपासून तं बूळग्यायवरी ना रिकामडेँ**यपासून(शिवी) तं आफीसरायवरी सप्पायसाटी तुजा मेला थोबडा मंजे जसा का हिरोच होता.. अंदर पोलिस पंचनामा करत होते तं तूले पावासाठी लोकायले घरात एंट्री नवती.. पर सप्पा बिजी मानसा त्यादिवसी कामधंदा सोडून (तसाई इतवारच होता) निस्ता तूले पावासाटी नव दा वाजेवरी भर तपनीत तेतीच उभे होते ना गा.. मले तं असे ढुंढून जे भेटत नवते ते भेटले त्या दिवसी.. भरमार दूरदूरुन आले होते निस्ता तूले पावासाटी...

मंग आखिरकार तूले बाहेर आणला.. आमी तं तसा तूले पायलून नवतून पर जे लोकं सकारी सकारी पायटलेच जातत ना (अगा डब्बे धरुन नायी गा...!) फिरावले का मनतत त्याले मार्निँग वाक का फार्निँग वाक तं त्यायच्यातल्या एकाले तूजे पाय दिसले होते खरा..! मंग पोलिसायले बोलवला असतील.. मनजे माले तं लागते सनवारच्या रातीच झाला असल तूजा काम तमाम है ना गा? तं पोलिसायना पोते हातरला जमिनीवर अना लोकायले मेन पोलिसाना सांगतलंन (माफ करा भाषेमुळे मान देऊ शकत नाही) "तर बघा तूम्हाला आतापर्यँत इथे थांबवून ठेवण्याचा इंटेन्शन एवढाच आहे कि जर तुमच्यातील कोणी याला ओळखत असेल कि हा कोण आहे, कूठला आहे तर सांगावं व याची ओळख पटावी... तर तुम्ही एक-एक करुन पुढे या, पहा व समोर निघत चला..." त्याच्यापयलेच आमाले फोटोग्राफर ना क्यामेऱ्यात तूही फोटू दाखवलन होतन.. तेबी अलग-अलग पोज मंदली.. तूना बी खिचला नससील तस्या पोज जिता अससील तई..! तरी आमी तूले ससारचा (खरोखर) पावासाटी थांबलेच होतून.. मंग आमी पायलून तूले.. नड्ड्यावर (गळा), पाटीवर ना पोटावर चाकूचे घाव होते, तोँड उघडा होता.. मोठा भयानक दिसत होतास पर आमाले भेव नायी लागला.. मंग कोणातरी ओरखलन ना तूजा असली सरनेम सांगतलन तो मी नाई लिवा या पतरात अना गाव सांगतलन.. अखीन एका मानसाना पुस्टी केलन (पेपर वाचता मून मी बी नक्कल मारुन रायलू पेपरावानी.. ) तं पुस्टी बी नायी समजे; पुस्टी मनजे तो तुच व्हस मून कनफरम गा.. मंग आमी घरी आलून.. त्याच्या बादमंदी पोलिसायना तूजा पोस्टमार्टम केला असतील नायी का..? अना मंग तूले तूया घरी नेऊन सोडला असतील..

तू तं मेलास.. आगीत भस्सम बी झाला अससील.. आमीना तूले पायलून तरी चूपच.. पर आजूबाजूच्या बाया.. ज्या आल्या नायी, गेल्या नायी, पायला नायी तरी त्यायचा चालू-- "कोणा कूत्र्यायना मारला असतील बाई... मानसं नसतील ते... जनावर असतील (हा तं खरी मनला).." पर तू जेती भेटलास तो घर बनतच होता.. वास्तूपूजन बी होवालेच होता ना रावाले बी जावाचेच होते तं या का मनत सांगू-- "कसे रायतील बाई ते.. भेव नायी लागल का? घर बनावच्या पयलेच मुर्द्यायना अपसकून केला.. आता तो (म्हणजे तू) भूत बनून तेती फिरसील.." मी खरी सांगता तूज्या मेल्यापासून कोणी तेती बिनकामानं नायी जाय रातच्याले.. अना असा सिरीफ तूज्याच नायी.. तं कोणी बी मेला मनजे होते.. आता तू बी येतीच रायत होतास तं तूले बी मालूमच असल मना.. नायी असा नायी.. पर मी मनता- "का झाला?" तू का जाणून बूजून थोडी गेलतास तेती मरावले.. खूदहून तूले मारला त्या घरी दूसऱ्यायना.. तसा तं भूत बीत राये नायी.. काऊनका माजा विस्वासच नसे भूतादैतावर.. पर आता तू वरतं गेलास तं तूले मालूम तूले देवाघरी रावाचे आये का भूत बनावचा आये?
पर हो.. जर भूत झालास गिलास तं एकदम माझ्याजवरच नोको येजो नायतं माले पतरं कायले लिवलास मून.. अना तू झोँबजो तं त्यायले ज्यायनं तूले मारला.. आता मालूम चालला का तू मोटा सिदा सादा होतास खरा.. 

तं मी हा पतरं तूले सांगावसाठी लिवून रायलू का माणूस मेल्यावर त्याचा का होते हा अलग मॅटर आहे पर त्याच्याबाऱ्यात त्याच्या संगचेच आमच्यासारके लोकं का सोचतत.. अना हा मालूम असून का एक दिवस सप्पायले जावाचाच आहे तरी!! तं जाऊ दे तो सब सोड आता.. मी सांगता त्या घराले आता दरवाजा लावला.. तूले एकच इनती हाय का जो झाला तो झाला.. बळा गलत झाला तूज्यासंगा पर जाऊ दे आता त्यायची सजा देव त्याले देयल पर तू आता देवाघरी गेलास तं देव बनून राय.. भूत बीत तं रायेच नायी.. हाच सांगावासाठी डॉ. नरेँद्र दाभोळकर सारखा देवमाणूस थकून केला पर हिँमत नायी हारला तं जनावरायना त्यायच्यासारक्या देवमाणसाले बी तूज्याचसारखा मारला.. तूले मालूमच असल पेपरात वाचला अससील तं.. ते आता तेतीच असतील.. तू त्यायले विचार डॉक्टर तूले माज्यावून चांगला समजवून सांगतील भूत-चुडैल च्या बाऱ्यात का हे निर्री अंदश्रद्दा व्हय मून.. अना हो चूकभूल माफ कर.. जेतीबी अससील सुखी राय..

देव तूज्या आत्म्याले शांती लाभू देवो...!


तुआ मेला चेहरा पायनेवाला एक अनोळखी पोरगा

-राजेश डी. हजारे

(लेखक 'अ.भा.मराठी साहित्य परिषद, पुणे' चे 'गोँदिया जिल्हाध्यक्ष' आहेत.)

आमगाव जि. गोँदिया

लेखन: 20 ऑक्टो. 2013 (रविवार)
शेवटचे अद्ययावत: 19 मे 2019 (रविवार)

  • स्त्रोत:

  1. न लिहिलेली पत्रे-14
  2. न लिहिलेली पत्रे-15
  3. #RDH Sir FB
  4. WhatsApp

Thursday, 17 October 2013

फ.मु.शिँदे यांना अभिनंदनपर पत्र

दिवस→ 389

अनुदिनी/ब्लॉग→76

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सन्माननीय श्री फ.मुं.शिँदे सर,

काल वृत्त वाचण्यात आले कि आपली '87व्या अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलनाच्या' अध्यक्षपदी निवड झाली.. तात्काळ मी हे वृत्त फेसबुक व ट्विटर वर शेअर केलं... सोबतीला आपला छायाचित्र हवा होता म्हणून गुगल वर शोधून पाहिला आपला नाव तेव्हा चित्रांसोबतच विकीपिडीया वर आपल्याबद्दल सविस्तर माहिती दिसली.. तेव्हाच आपणास या निमित्ताने पत्र पाठवण्याचा माणस झाला... सोबतच आपल्या फेसबुक पेजविषयी पण कळलं.. आता तो तुमचाच आहे कि तुमच्या नावाने कोण्या दुसऱ्याच व्यक्तीने बनवून ठेवलाय ते माहित नाही पण कळवा जरुर...

तसं बघितलं तर आपली ओळख मी शाळेत शिकायचो तेव्हापासूनची... म्हणजे हो मला कळतय आपण मला ओळखत नाही.. पण मी आपणास ओळखायला लागलो ते शाळेत असतानापासून.. मला इयत्ता आठवत नाही पण इतकं अवश्य आठवतंय कि आठवी अथवा आठवीपुर्वीच्या मराठी बालभारती च्या पाठ्यक्रमात आम्हाला आपण लिहिलेली प्रसिद्ध 'आई' ही कविता होती... वर्ग आठवत नसल्याने आतापर्यँतच्या (1ली पासून ते अगदी डीटीएड पर्यँत) सर्व मराठी शिक्षकांची नावे आठवत असूनदेखील नेमक्या शिक्षकाचे नाव सांगू शकत नाही.. पण ती कविता शिकवण्यापुर्वी शिक्षकाने सांगितलेला लेखक परिचय व त्यातलेच त्या कवितेचे कवी 'फ.मु.शिँदे' अगदी 'फकीर मुंजाजी शिँदे' या आपल्या पूर्ण नावासह लक्षात आहेत ते आजपर्यँत.. मी शिकलेल्या बऱ्याच कविता विसरल्यात मात्र 'आई' ही कविता आणि तीचे कवी आजही स्मरणात आहेत.. कारण 'आई' हा प्रत्येकासाठी अगदी जवळचा (किँबहुना पहिलाच) शब्द.. आणि आपण काय सोपं व तितकच भावस्पर्शी वर्णन केलं आईचं त्या कवितेत तो ही अगदी साध्या व सोप्या भाषेत..

मी ती कविता शिकत असताना कधी स्वप्नातही विचार वा कल्पना केली नव्हती की मी कधी आपणास पत्र पाठवीन.. या साहित्यिक क्षेत्रात येण्याचं तर कधी स्वप्नातही आलं नव्हतं.. पण योगायोगाने मी या क्षेत्राकडे वळलो तो हि फक्त छंद म्हणून नव्हे तर अगदी 'प्रोफेशन' म्हणून तेसुद्धा तरुण वयात.. मी जाणतो कदाचित या क्षेत्रात पैसा नसेल पण आपल्या लेखनीत ताकत असेल तर एक दिवस तो ही एक दिवस निर्माण होईल याच क्षेत्रातून... आज मी 'अखिल भारतीय मराठी साहित्य परिषद, पुणे' च्या 'गोंदिया जिल्हा शाखेच्या जिल्हाध्यक्ष' पदावर कार्यरत आहे.. ही हि एक समाजसेवाच आहे... आणि पैसा मिळत नसला तरी या सर्वाँतून मिळणारा मानसिक समाधान खुप मोठा आहे.. मी जाणतो "पैसा खुप काही असला तरी सर्वकाही नाही.." आणि या मानसिक समाधानाची तुलना पैशाची होऊच शकत नाही.. मी कधी स्वप्नातही विचार केला नव्हता की आपणास भेटण्याचा (किँवा प्रत्यक्ष पाहण्याचा) कधी योग येईल.. होय कारण मी पुणे पासून भरपूर लांब (अगदी विरुद्ध टोकावरीलच) गोँदिया जिल्ह्यातील आमगाव या तालुक्याच्या ठिकाणी वास्तव्यास असून देखील पुणे जिल्ह्यातील 'सासवड' येथे 3, 4 व 5 जानेवारी 2014 रोजी आयोजित '87 व्या अ.भा. मराठी साहित्य संमेलनासाठी' येत आहे.. तसे मी या फक्त 20 वर्षाच्या आयुष्यात बरीच छोटी मोठी साहित्यसंमेलने पार पाडली आहेत, पण इतक्या मोठ्या व विशेषत: इतक्या प्रतिष्ठित व मानाच्या साहित्य संमेलनाला हजेरी लावण्याची ही माझ्यासाठी पहिलीच संधी असेल... मला निमंत्रण पण मिळालेय.. आणि माझ्यासारख्या नवोदित साहित्यिकासाठी स्वाभाविकच ही खुप आनंद व अभिमानास्पद बाब आहे...

असो... आपणाशी बोलण्या व सांगण्यासारखं बरंच काही आहे कारण आपण स्वत:च्या कर्तृत्वाने लेखनीद्वारे व वयानेही खुपच मोठे आहात आणि त्यामुळे आपली किमयाही फारच न्यारी व महतीही खुपच मोठी आहे.. पण पत्राला काही मर्यादा आहेत त्या पाळाव्या लागतील.. आणि आपण आता खुप व्यस्त असाल त्यामुळे पत्र वाचाल कि नाही काय माहिती पण हातात पडल्यास वाचालच ही आशा करतो.. जर पत्र वाचून झाला असेल तर प्रतिक्रीया नक्की द्या पत्राद्वारे... माझा पत्ता व संपर्क क्रमांक माझ्या फेसबुकच्या भिँतीवरुन आपणास मिळूनच जाईल आणि तरीही मी शेवटी नोँदवलाय.. शेवटी साहित्यसंमेलनात आपली प्रत्यक्ष भेट (पाहणे होईलच) 5-10 सेकंदांची का होईना पण त्या व्यस्त कार्यक्रमात भेटही होईल जर अल्लाहची (मी हिँदु आहे) ईच्छा असली तर... काही चुकले असेल तर मोठ्या मनाने माफ करावे... आपला आशीर्वाद नेहमी पाठीशी असेल हा विश्वास आहे.. आपली लेखनी तडपत राहो हि सदिच्छा व्यक्त करतो...

आणि या पत्राचा समारोप करण्यापुर्वी तुमचीच आई ही कविता (ज्यामुळे मी आपणास ओळखू लागलो) विषय निघालाच आहे तर ती इथे नमूद करतोय..

आई एक नाव असतं
घरातल्या घरात गजबजलेलं
गाव असतं !
...
आई असतो एक धागा
वातीला उजेड दावणारी
समईतली जागा...
...
घर उजळतं तेव्हा
तिचं नसतं भान
विझून गेली अंधारात की
सैरावैरा धावायला
कमी पडतं रान !
...
अरे ! आणि आपणास शुभेच्छा द्यायच्या राहूनच गेल्या कि... 87 व्या अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलनाच्या संमेलनाध्यक्षपदी निवड झाल्याबद्दल आपले खुप खुप अभिनंदन ..!
आपलाच चाहता
एक नवोदित साहित्यिक
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राजेश डी. हजारे (RDH)
भ्रमणध्वनी क्र.- 07588887401
पत्ता-कामठा रोड आमगाव ता. आमगाव जि. गोँदिया- 441902
~(गोँदिया जिल्हाध्यक्ष- अ.भा. मराठी साहित्य परिषद, पुणे)

Saturday, 12 October 2013

आसुमल हरपलानी ते 'संत' (न)आसाराम

BlogPost==> 73rd

Day==> 384

अप्रिय आसाराम...
मी माफीही मागत नाही कि मी तुम्हाला प्रिय प.पु. संत श्री बापू असं म्हटलं नाही.. कारण मी मानतच नाही.. तसं मी यापूर्वीही तुमचा कोणी मोठा भक्त वा समर्थक नव्हतो व आता तर प्रश्नच नाही... कारण जे बहूसंख्य होते ते आता तर थोडेफार राहिले असतील.. व त्यातलेही काही पश्चात्तापच करत असतील..!

पण मी एक खरं सांगू.. ज्यादिवशी तुमच्यावर पहिल्यांदा 'बलात्काराचा' आरोप लावला गेला व जेव्हा प्रसारमाध्यमे (मिडीया) तुम्हाला विनापुरावा पोलिसांच्या चौकशीपुर्वीच धारेवर धरत होती.. त्यांनी तुम्हाला तेव्हाच गुन्हेगार संबोधलं होतं त्यावेळी मीच तुमची बाजू घेत "आसाराम यांची पोलिसांद्वारे चौकशी होऊ द्यावी त्यात गुन्हा सिद्ध झाला तर नंतर मग मिडियाने तुम्हाला गुन्हेगार संबोधावं" असं ट्वीट केलं होतं.. पण ते चूकीचे नव्हते.. जेव्हा तुम्ही पोलिसांसमोर समर्पण करण्याऐवजी इकडे-तिकडे लपत नव-नवे बहाणे बनवत होते ना.. तेव्हाच मलाही पटलं "सच मे जरुर दाल मेँ जरूर कूछ काला हैँ..." आणि नंतर माझंही मत बदललं.. मी स्वत: परत मिडीयाची माफी मागत तेच बरोबर असल्याचं पण नवीन ट्वीटद्वारे कबूल केलं होतं...

आसाराम, तुम्ही स्वत: आश्वासन दिलं होतं कि "सध्या माझे सत्संग सुरु असल्याने 30 तारखेनंतर मी स्वत: समर्पण करून पोलिस चौकशीत मदत करीन.".. पण तुम्ही तर मूदत संपून 2 दिवसांनंतरही इंदौरच्या आश्रमात विश्रांती घेत होतात... मला अचंबा वाटतो की तिथले पोलिस कसे मिडीयाने जोर धरेपर्यँत तूम्हाला अटक करण्यास धजावले नाहीत... शेवटी मानलं तुम्हाला! पण माघार घेणार ते भारतीय पोलिस कसले? डोंबले ना तुरुंगात शेवटी! तुमचा कितीही दबदबा असला तरी...! तुम्ही गुन्हेगार असल्याचं मला तेव्हाच कळलं होतं जेव्हा विमानामध्ये तुमचे (विशेषत: महिला) समर्थक 'आजतक' या नॅशनल खाजगी वृत्तवाहिनीच्या पत्रकारांशी शिव्यागाळ व मारपीठ सारखे असभ्य वर्तन करत होते आणि तुम्ही दुपट्ट्याने तोँड झाकत होतात... म्हणे 'प्रायव्हसी' चा विचार केला.. मी म्हणतो तुम्ही उत्तर द्यायचं होतं ना... प्रायव्हसी च्या कारणाने कारवाई झाली असती ती केली असती विमान कंपनीने संबंधित वाहिनीवर.. त्याची तुम्हाला काय पडली होती एवढी ?

मी तूम्हाला सन्मानाने 'जी' संबोधतोय याचं कारण एवढंच कि तुम्ही वयाने मोठे आहात.. पण तुम्ही तर दिडशे वर्षे जगण्याची ईच्छा ठेवता म्हणे... हे वाईट नाही हो... पण तुम्हाला कोणत्या पुस्तकात कळलं तर कोण जाणे दिर्घायुष्यासाठीच तुम्ही (अर्शकल्प, आणि अजून कोणकोणते मला 'नॉलेज' नाही) शक्तीवर्धक (अंमली पदार्थ सुद्धा!) औषधी सेवन करुन अल्पवयीन मुलीँचे लैँगिक शोषण करत होतात खरं..! कोणी म्हणतं तुम्हाला लहान मुलीँशी वासनाच्छेचा आजार जडलाय काय नाव त्याचं... मी विसरलोच बघा... मग तर मोठमोठाले ऋषीमुनी कित्येक वर्षे जगले त्या सर्वाँनी तीच पुस्तक वाचली होती काय? वा रे मेरे संत!

माझ्या माहितीनूसार तुमचं खरं नाव आसुमल थाउमल हरपलानी उर्फ आसुमल सिरुमलानी.. जन्म 17 एप्रिल 1941 रोजी सध्या पाकिस्तानात असलेल्या तत्कालीनी ब्रिटीश भारतातील नवाबशाह जिल्ह्यातील विरानी गावात मेहनगीबा (आई) व थाऊमल सिरुमलानी (वडील) च्या घरी.. 'थँक्स गॉड' तुमचा जन्म एक दिवस उशीरा झाला नाही अन्यथा माझ्याही मनात एक सल आयुष्यभर राहिली असती की माझा वाढदिवस कुकर्मी आसारामच्या वाढदिवसी येतो.. ईश्वरानं मला सुदैवानं 18 एप्रिल 1992 रोजी 'भारतरत्न' महर्षी धोँडो केशव कर्वे सारख्या समाजसुधारकाच्या वाढदिवसी या पृथ्वीवर पाठवलं.. तुम्ही पंक्चर दुरुस्तीचे काम करत होतात.. तुमचा मालक जवळच एका संताचे प्रवचन ऐकण्यास जायचा.. कधी मधी तुम्ही पण सोबत जायचे.. मग तुमच्या मनात आलं कि-- हा तर मस्त काम आहे.. काही वेळ प्रवचन करायचं.. मान, सन्मान, प्रसिद्धी मिळते.. अन्  दक्षिणेच्या नावाखाली वारेमाप पैसासुद्धा... सोबतच स्त्री-पुरुष, मुले-मुली, भक्त जमतात.. पाया पडतात.. आशीर्वादाच्या बहाण्याने प्रत्येक वयाच्या स्त्री-पुरुषास स्पर्श करता येतो... तुम्हाला काय पाहिजे होतं अजून... मग काय?? सुरु केला तुम्ही आसुमल चे आसाराम असे नामकरण करत स्वत:च स्वत:ला प.पु.संत आसाराम बापु अशा एक ना अनेक पदव्या घोषित करुण प्रवचनगिरीचा व्यवसाय... खरंतर इथंच चुकलं तुमचं... तुम्ही आपला नाव आशाराम वा 'आसाराम' ऐवजी 'नासाराम' ठेवावयास हवं होतं... पण काहीही म्हणा तुम्हाला तरुण मुलींना आशीर्वाद देण्यात जरा जास्तच रस होता नाही का? खरे संत फक्त डोक्यावर हात ठेवून मनापासून आशीर्वाद देतात; पण तुम्हाला समर्पणाच्या नावाखाली स्वतंत्र खोलीत बोलावून तरुणीँच्या बाह्य व आंतरीक अंगाअंगाला स्पर्श करत आशीर्वाद देण्याचे जरा जास्तच कौशल्य होते.. आणि पिडीत तरुणी बिचारी विरोधात 'ब्र' ही उच्चारु शकत नव्हती..


Source: i.ndtvimg.com

कारण बहुसंख्य समर्थक जे होते तुमची बाजु घेण्यासाठी.. सोबतच अशा कार्यातून तुम्हाला वाचवणारे सहकारी देखील... शिवाय तुम्हाला वाटत असावं कदाचित भोळ्या भाबड्या भक्तांच्या आस्थेचे बाजारीकरण करुन कमावलेल्या वारेमाप संपत्तीच्या बळावर व प्राप्त समर्थकांच्या विरोधाच्या बळावर करत राहू तरुण वयातील कोवळ्या मुलीँवर लैँगिक अत्याचार आणि वाचून जाऊ भारताच्या कायद्यापासून... पण ते कदापि शक्य नाही... आणि आता कायद्याच्या कचाट्यात सापडल्यावर येताहेत भुतपूर्व पिडीत मुली एकेक करुण पुढे तुमच्या विरोधात खटले दाखल करण्यासाठी...

आता तर तुमच्या विषयी फक्त प्राथमिक माहिती पुढे आलीय.. ये तो अभी ट्रेलर है मेरे आसा.. अब तो पुरी पिक्चर बाकी है... आता जेव्हा मी तुमच्या विरोधात इतर विविध पोलिस ठाण्यात पिडीतांद्वारे एफआयआर नोँद होताना पाहतो व तुमच्या आश्रमातीलच तुमच्याच भुतपूर्व सहयोग्यांचे तुमच्याचविरोधात मते व आश्रमासंबंधी वादग्रस्त प्रश्न निर्माण करणाऱ्या प्रतिक्रीया ऐकतो तेव्हा मला वाटतं कि किती भोळे आहेत आमच्या भारतातील भक्त! आणि कसे फसवत होतात तुम्ही भाबड्या भक्तांना... अन् आम्हीही कसं विश्वास ठेवतो तुमच्यासारख्या स्वघोषित संतांवर स्वत:च्या बंद डोळ्यांनी... तुमच्यासारख्या ढोँगी बाबांची सत्यता कळल्यावर मी देवाला प्रार्थनाच करु शकतो की एक दिवस असा न येवो की जे खरंच स्वत:ला संत म्हणून फक्त म्हणवूनच घेत नाही तर वास्तविक वैयक्तिक जीवनात आचरणही करतात संतांसारखाच अशांवरचा विश्वास व श्रद्धेला कलंक लागू न देवो रे बाबा !! अन्यथा संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर, संत निवृत्तीनाथ, संत सोपानदेव, संत एकनाथ, संत चोखामेळा, संत जनाबाई, संत मीराबाई, संत कबीर, संत गोराकुंभार, संत सैय्यद मोहम्मद ताजुद्दीन बाबा, संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती बाबा, ईश्वरतूल्य संत साईबाबा, संत गजानन महाराज, विसाव्या शतकातील प्रबोधनकार राष्ट्रसंत वंदनीय तुकडोजी महाराज या व अशा कितीतरी तसेच ज्यांनी अखिल मानवजातीस ईश्वर दगडांच्या मंदिरात नसून माणसात आहे ही ग्राम स्वच्छतेच्या मूलमंत्रासोबतच बहुमूल्य शिकवण दिली त्या संत गाडगेबाबा महाराजांच्या महाराष्ट्र व भारत देशातील हिँदूंच्या धार्मिक अस्मितेला कदापि काळीमा फासला जाऊ नये; आणि कलंकाचा डाग तर सोडा पण छोटासा छिट्टा सुद्धा उडवला जाऊ नये...

अप्रिय आसाराम.. तुम्ही तर कलंकित झालातच पण आपल्या या दुष्कृत्यात मुलगा नारायण प्रेम साई सिरुमलानी ला सुद्धा सामाऊन घेतलंत... असा कोणता बाप असेल जो कुकर्मात स्वत:च्या मुलाला सामाऊन घेईल.. आणि असंच करायचं होतं तर का दिलं त्या बलात्कारी पोराला ईश्वरतूल्य साई बाबा चं पवित्र नाव... सुरत ठाण्यात दोन सख्ख्या बहिणीँनी त्याच्याविरुद्धही लैँगिक अत्याचाराचा खटला नोँदवलाय.. हे तर काहिच नाही.. या सर्व खेळात संपूर्ण कुटूंबच सहभागी आहे खरं तुमचा... अर्थात तुमची पत्नी लक्ष्मीदेवी व मुलगी भारतीदेवी सुद्धा... फक्त नावासमोर देवी लावल्यानं कोणी साक्षात देवी बनून जात नाही.. आता तर तुमचा अवघा परिवारच अदृश्य आहे खरं... ते सर्व गायब आहेत... तुम्हीच जाणोत कुठं असतील ते... कारण आपण तर 'साक्षात परमेश्वराचेच अवतार' आहात ना !!! माहित असेल तर सांगून द्या कुठे लपून बसलेत ते... सुरत पोलिस मागावर आहेत त्यांच्याही.. मला तर नारायण साईवर पुर्वीपासुनच संशय होता... जेव्हापासून एका पहाडी जंगलातील त्याच्या गुप्त गुफेबद्दल 'इंडिया टीव्ही' या अजून एका प्रसिद्ध राष्ट्रीय खाजगी वृत्तवाहिनीवर पाहिलं व ऐकलं तेव्हापासूनच... नुकतच ऐकायला मिळालं कि तुमचा मुलगा हि उठून सुटून निरर्थक बहाणेबाजी करतोय याचिकाकर्त्याँविरुद्ध.. आणि करु लागलाय खरं जाहिरात स्वत: निर्दोष असल्याची स्थानिक वृत्तपत्रांमधून.. पण आम्ही यावर विश्वास कसा ठेवावा.. एक म्हण आहे बघा आमच्यात "मंदीराची इमारत मजबूत असण्यासाठी सर्वप्रथम त्याचा पाया मजबूत असावा लागतो.." आणि इथे तर मंदिराचा पाया अर्थात परिवाराचा मुखिया म्हणजे तुम्हीच कलंकित असल्यावर मंदिर म्हणजे तुमच्या परिवारातील इतर सदस्यांवर या कलंकाचा एक छिट्टा उडाला नसेल हे शक्यच कसे आहे? आणि जर तुमचा परिवार आहे निर्दोष खरोखरच तर येत का नाही समोर सुरत पोलिसांच्या..? का करावं लागतंय पोलिसांना त्याचा शोध ठिकठिकाणी 6 टिम बनवून...?

असो... मी बरंच बोललो या पत्राच्या माध्यमातून.. मी ना तुमचा समर्थक ना विरोधक! मला काय आवश्यकता होती एवढं लिहिण्याची कोण जाणे.. पण एकमात्र नक्की! माझे शब्द तुम्हाला टोचले कि नाही माहित नाही कारण तुम्ही ठरले ते शेवटी 'बेशरम'च! पण तुमच्या आताही असलेल्या समर्थकांना निश्चितच टोचले असतील माझे शब्द... मला जाणीव आहे त्याची... कारण जसे आज तुमचे विरोधक तूमचे समर्थन करणारे वक्तव्य ऐकू शकत नाही तसंच तूमचे आजही टिकून असलेले समर्थक सुद्धा आपल्या 'परमात्म्याविरुद्ध' काही ऐकू ईच्छिणार नाही मी जाणतो... पण त्यांच्यावर जरा जास्तच प्रभाव दिसतो आपला... किमान त्यांचा तरी विचार करावयास हवा होता तोँड काळा करण्यापूर्वी.. इतकं सगळं होऊनही व नवनवे कटू सत्य बाहेर येणं सूरुच असूनदेखील त्यांचा अद्यापही तूमच्यावरचा विश्वास टिकून आहे... मी तूमची माफी कदापि मागणार नाही पण माफी मागतो त्या सर्व समर्थकांची... माझा उद्देश त्यांच्या भावना दुखावण्याचा मुळीच नाही.. पण हेच कटु सत्य आहे.. मी जाणतो हे थोडं कठिण आहे पण एक दिवस त्यांनाही जाणीव होईल वस्तुस्थितीची कि तुम्ही कोणी 'संत' वगैरे नसून फक्त 'बलात्कारी बाबा' आहात... होय पैशाचा हव्यासु, किशोरवयीन मुलीँशी शरीरसुख मिळवण्यासाठी वासनेच्छा तृप्त करण्यासाठी टपूनच असलेला एक बिमार वृद्ध राक्षस! निव्वळ एक पाखंडी!! मला हे कळत नाही कि एकीकडे अवघा संत समाज तुम्हाला संत बिरादरीत नाकारत असताना अ.भा. संत महासभेचे/अखाडा परिषद चे अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणी महाराज का घेत आहेत तुमची बाजू?? खाजगी वृत्तवाहिन्यांवर आयोजित परिसंवादात का देताहेत ते वादग्रस्त विधाने व का जोडतात संबंध तुमच्या कूकर्मांचा साधारण परंतू संवेदनशील घटनांशी? तुमची साठगाठ तर नाही ना? अन्यथा असेल भिती त्यांना कि एका पापी संतामुळे उडून जाईल जनतेचा विश्वास संत समाजावरुन-- पण हे कदापि शक्य नाही.. संतांवरचा आमचा विश्वास व श्रद्धा अढळ आहे.. ती कमी होणार नाही.. पण एक मात्र नक्की! आता करु लागतील किमान काहितरी सुजाण भक्त चौकसबुद्धीने विचार संतांना संत मानण्यापूर्वी एकदातरी... आणि आता अपेक्षाही आहे सुजाण भक्तांकडून ती एवढ्याचीच...


तुमचा ना समर्थक ना विरोधक
एक चौकसबुद्धीचा आस्तिक

-राजेश डी. हजारे (RDH Sir)
-12/10/2013, आमगाव
(पत्र लेखक अ.भा. मराठी साहित्य परिषद, पुणे चे गोंदिया जिल्हाध्यक्ष आहेत. )

  • ता. क.: 25 एप्रिल 2018 रोजी आसाराम ला बलात्काराच्या आरोपात दोषी मानत जोधपुर न्यायालयाने आजीवन कारावास चा दंड सुनावला आहे. 


  • पुर्वप्रसिद्धी:
 

Thursday, 3 October 2013

जुमदेवबाबास पत्र

...सुरुवातीपासून वाचा

तसं मी 'परमात्मा एक' या मार्गाचा सेवक नाही पण या मार्गाच्या सेवकांशी माझा संपर्क येऊन गेला (त्या दिवशी तर विशेषत्वाने) आणि भविष्यात येणारच.. पण मी हिँदु धर्मीय असलो तरी माझ्यावर ईस्लामचा बराच प्रभाव आहे.. त्यामुळे साहजिकच मी 'परमात्मा एक' या एकमेव सत्याचा (मार्गाचा नसलो तरी) अनुयायी आहे... आपणास माहित असेलच रामटेक येथे तुमचा खुप मोठा (आश्रम/मंदिर/देऊळ/मठ/आणखी काही नेमकं काय म्हणतात माहित नाही) पण आहे..आणि जवळच 'हजरत बाबा सैय्यद गंजुशाह रहमतुल्लाह अलैह' यांचा दर्गासुद्धा.. मी दर्ग्यात जात असताना बहुतेक वेळा तुमच्याकडे येवुन नतमस्तक व्हायचो.. 'परमात्मा एक' सेवकांसाठी हे योग्य असले तरी मी मानत असलेल्या ईस्लाम मध्ये एकमेव 'अल्लाह' व्यतीरिक्त कुणापुढेही नतमस्तक होणं नियमात बसत नाही पण काय करणार..? शेवटी मी जन्मलो व वावरतो तर हिँदू म्हणूनच ना!

असो.. 3 एप्रिल व 3 ऑक्टोबर ला दरवर्षी तुमच्या जयंती व पुण्यतीथीनिमित्त वर्धमान नगर नागपूर नागपूर व मौदा येथे 'परमात्मा एक' सेवकांचा बराच मोठा कार्यक्रम असतो खरं... शक्य झालं व कधी योग आला तर तिथेही येईन भविष्यात पण प्रॉमिस नाही करत..

असो... काही चुक-भूल झाली असेल तर क्षमा मागतो.. असंही 'क्षमा' हा तुमच्या व तुमच्या सेवकांचा महत्त्वाचा गुण आहेच.. शेवटी तुमच्या पुण्यतिथीनिमित्त तुम्हास पाठवत असलेल्या या पत्राला नुकतीच प्रकाशित तुमचीच टपाल तिकीट जोडलीय..

आशीर्वाद व कृपा असावी..
मार्गाचा नसलो तरी एक सेवक
राजेश डी. हजारे
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-आमगाव
(03 ऑक्टो. 2013, गुरुवार)

जुमदेवबाबास पत्र

दिवस---> 375वा

अनुदिनी/ब्लॉग---> 70वा

प.पु. महानत्यागी श्री जुमदेवजी बाबा,
आज 3 ऑक्टोबर 2013.. आपली पुण्यतिथी.. त्या स्मृतीप्रित्यर्थ माझं आपणास नमन... तसं पाहिलं तर काही आपणास पत्र पाठवण्याचा बेत नव्हताच.. परंतु नेरवाच्या दिवसी 30 सप्टेँबर 2013 रोज सोमवारला गोँदिया येथील मनोहरभाई पटेल अभियांत्रिकी महाविद्यालयात (MIET) तुमच्या स्मृतीप्रित्यर्थ डाक तिकीट प्रकाशनाचा कार्यक्रम पार पडला.. मी तसं उपस्थित राहणार नव्हतोच म्हणा पण कार्यक्रमाच्या व्यासपीठावर VVIP राजकीय नेते राहणार होतो.. आणि असणार का नाही म्हणा..! जिल्ह्याचे खासदार ना. प्रफुल पटेल सारखे दमदार नेते केँद्रीय अवजड उद्योग व सार्वजनिक उपक्रममंत्री असल्यावर..

तर नियोजनाप्रमाणे मी सकाळी गोँदियाच्या एन.एम.डी. महाविद्यालयात गेलो..तसं माझं तिथे वैयक्तिक काम होतं.. पण तुम्हाला सांगू का हा तुमच्या तिकीट प्रकाशनाचा कार्यक्रम प्रारंभी याच परिसरात डी.बी. सायन्स कॉलेजमध्ये होता.. या कार्यक्रमामुळे तेथुन कोणत्या तरी परिक्षेचं केँद्र रद्द करण्यात आलं खरं.. कार्यक्रमाचा मंच उभारणार तोच जागा मर्यादित असल्याच्या कारणाने कार्यक्रमाचे स्थान MIET त स्थलांतरीत करण्यात आल्याचं कळलं.. मला तर नवलच वाटलं बुवा! बाबा जुमदेवजीच्या साध्या डाक तिकीट प्रकाशनासाठी एवढी काय गर्दी असणार? असंच मला वाटलं होतं पण---

मी गोँदियात पोचल्यापासूनच कितीतरी 'परमात्मा एक' सेवकांचे जत्थेचे जत्थे पायदळी कार्यक्रमस्थळी जाताना दिसत होते.. मी हि निघालो एनएमडी तून आणि थोड्याच अंतरावर एका प्रौढ व्यक्नीने हात दाखवला.. त्यांना मी दुचाकीवर लिफ्ट दिली.. त्यांनाही तुमच्याच कार्यक्रमास जायचं होतं व योगायोगाने मला पण.. त्या दिवशी सुरक्षेच्या कारणाने शहरातील ऑटो रिक्षा बंद असावेत बहुतेक..! MIET त पोहोचताच डोळ्यांवर विश्वास होत नव्हता.. अहो खरंच..माझा अंदाज फोल ठरला होता.. जिकडे तिकडे वाहने व माणसांव्यतीरिक्त काहीच दिसत नव्हते..

कार्यक्रम नुकताच सुरु झालेला.. मंचावर उपस्थित केँद्रात मंत्री असलेल्या बऱ्याच मंत्र्यांची भाषणे तसेच कार्यक्रमाचे प्रमुख अतिथी ना. प्रफूल पटेल यांचे भाषण झालेले.. अध्यक्षस्थानावरुन महाराष्ट्र राज्याचे राज्यपाल श्री के. शंकरनारायणन यांनी भाषण दिले ज्यात आपल्या कार्याचा त्यांनी उल्लेख केला.. व भारत सरकारद्वारा प्रसिद्ध तुमच्या डाक तिकीटाचे प्रकाशन कार्यक्रमाचे उद्घाटक भारताचे उपराष्ट्रपती मा. ना. डॉ. श्री मो. हामिद अन्सारी यांच्या हस्ते झाले.. भारताच्या उपराष्ट्रपतीँनी आपल्या भाषणात वारंवार प्रफूल पटेलांचे कार्य, गोँदिया जिल्ह्याचा विकास इ. बाबीँचा आवर्जून उल्लेख केला.. आणि राष्ट्रगीताने कार्यक्रमाची सांगता झाली...

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माझ्या नजरेत आपली ओळख 'परमात्मा एक' चे संस्थापक (जुमदेवजी ठुब्रिकर) इतकीच होती पण ती या कार्यक्रमाने खऱ्या अर्थाने कळली.. कार्यक्रमासाठी लावलेल्या हजारो खुर्च्या सेवकांनी गच्च भरल्या होत्या आणि त्याच्याही दुप्पट सेवक दोन्ही बाजुला शांतपणे उभे होते.. जितपर्यँत नजर जाईल तिथपर्यँत डोळ्यांना आपल्या सेवकांचेच दर्शन होत होते.. आणि कार्यक्रम संपल्यानंतरही हजार-दोन हजार सेवकांचे येणे सुरुच होते.. मी ज्यांना लिफ्ट दिली होती ते संजय वानखेडे सुद्धा 'परमात्मा एक' सेवक असून ते स्वत: चंद्रपूर हून आलेले होते.. हिँगना, नागपूर सारखे सबंध महाराष्ट्र व कदाचित आंतरराज्यातुनही आलेल्या आपल्या मार्गाच्या सेवकांनी MIET चे प्रांगण अगदी तुडुंब भरले होते.. काटोल हून तर अवघी बसची बसच बुक करुन आलेली होती.. मला नंतर तुमच्या सेवकांकडून कळलं कि 'परमात्मा एक' चा कार्यक्रम कुठेही असो सेवकांना कळल्यास जातातच.. ते ही कोणतीही अपेक्षा न ठेवता स्वखर्चाने.. अल्पोहाराची आयोजकांकडून व्यवस्था असुनदेखील सेवक स्वत: आणलेले डबे, अल्पोहार अथवा स्वखर्चाने नाश्ता खरेदी करुन शांतपणे ग्रहण करत होते...

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माझ्या मनात 'परमात्मा एक' म्हणजे घराच्या दाराला लावलेली "दारु पिऊन आत येण्यास मनाई आहे." ही पाटी हि एकच ओळख होती.. पण नेरवाच्या कार्यक्रमाच्या निमित्ताने मला आपण जीवनभर महानत्याग करुन अंधश्रद्धा विरोधी व व्यसनमुक्तीसाठी केलेल्या कार्याबद्दल जाणुन घेता आले.. जसे 3 शब्द, 4 तत्त्व, 5 नियम.. कच्चे सेवक, पक्के सेवक.. हातावर पर्वत घेऊन उडत्या हनुमानाचेच प्रतिक म्हणून स्विकार, जात-धर्म कसलाही भेद न करता मानवतावादाचा पुरस्कार.. वगैरे वगैरे.. आणि बरंच काही...

पुढे वाचा→ readmore.png

Monday, 23 September 2013

22 सप्टेँबर - ताईस पत्र

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त्या दिवशी मला बोलावून तासभर संवाद साधण्यामागे तुझा हेतू काय होता ते तर मला कळलं नाही.. पण मी तूला एक सांगू ईच्छितो ताई.. आज आपण जरी स्वगावी राहत असलो, आपल्यात बराच अंतर असला.. व त्या सुखद दिवसानंतर 2 वर्ष लोटलेत.. तुला कदाचित वाटत असेल कि तूझा न मानलेला भाऊ तूला विसरला.. पण नाही ताई.. याचा पुरावा हा पत्र आहे.. आपल्यात संपर्क नाही याचा अर्थ असा नाही ताई कि मी तुला विसरलोय वा तुझा नंबर माझ्याकडे नाही.. तो आहे पण भिती वाटते आजही तुझी आणि नाही करत फोन कितीही आठवण येत असली तरी कारण उगाचच होऊ नये त्रास तुला माझ्यामुळे म्हणून.. कारण काळजी आहे मला माझ्या ताईची.. मला नाही आवडणार तुला एका मुलाचा फोन आल्याचे घरच्यांना कळल्यास त्यांनी तुला काही प्रश्न केलेलं.. तो ही तुझा दोष नसताना.. म्हणून आजही पुर्वीप्रमाणेच तुझ्या छायाचित्रांशीच बोलतो वा बोलतो तुझी कल्पना करुन स्वत:च स्वत:शी एकांतात वा लिहित असतो तुला पत्रे माझ्या दैनंदिनीत व वाचत बसतो एकटाच वेळ मिळेल तेव्हा.. मला माहितीये ताई हा पत्र प्रसिद्ध होत असल्याने वाचकवर्ग हसेल माझ्यावर.. म्हणतील असलाही काय वेडेपणा!! कारण त्यांना बहिण असेल.. आणि नसलीही तर उणीव भासत नसेल बहिणीची.. पण मला किँमत कळतेय बहिण नसल्याची.. आणि म्हणूनच आजच्या वर्गमैत्रिणीँशी प्रेमाचे सोँग करणा-यांच्या युगात व वातावरणात मी मानलं तूझ्या रुपात माझ्या वर्गमैत्रिणीला मोठी बहिण.. तो ही जात-पात, धर्म, वय सर्व बाबींना अलिप्त ठेवून.. कारण या बाबी पवित्र नात्याच्या आड येवू शकत नाहीत.. आणि तुला सांगू ईच्छितो ताई आता मी पण (हिँदू असून) तुम्हा मुस्लिम बंधु-भगिणीँचा पवित्र धर्मग्रंथ 'कुरआन' वाचतोय.. तो ही जीवाभावापासून..! काय झालं तु मला भाऊ मानलं नाही? मी कधी तुला भाऊ मानच म्हणून बळजबरी केली नाही वा त्रास दिला नाही.. बस् घुटमळत बसतो एकटाच.. मी जाणतो ताई जरी तु मला भाऊ मानत नसली तरी कुठे ना कुठे असेलच जागा या भावासाठी तुझ्या हृदयात.. अन्यथा कशाला लिहिलं असतं तु टोपणनाव "तुमची ताई" म्हणून माझ्या स्लॅम मध्ये?

ताई, त्या दिवशी मला तु भाऊ मानलं नाही पण आश्वासन दिलं होतं कि "वाटल्यास जमलंच तर... लग्नाला बोलवूऽऽऽ..." मी आठवण करुन देतोय ताई किमान एवढं तरी करशील माझ्यासाठी.. "ताईचं प्रेम नाही तर ना सही पण तीचा 'निकाह' तरी या दुर्दैवी भावाला नसीब होऊ दे... तुला माझी शप्पथ." तु तर मला नि:संकोच बोलण्याची संधी दिली होतीस गं.. पण त्या वेळी माझ्याकडे शब्द नव्हते; होते ते फक्त अश्रू! तुझ्या खोलीतून बाहेर पडल्यानंतर मला भरपूर काही आठवत होऊ बोलण्यासारखं पण वेळ निघून गेली होती.. आता आजही खंत आहे मनात तु संधी देऊनपण मी मनसोक्त बोलू शकलो नाही.. मला भरपूर बोलायचं होतं.. 2 वर्ष रडत असताना जे थोडेफार आनंदाश्रू साठवले होते याच सुखद दिवसासाठी ते तरळतसुद्धा होते.. ती अश्रूसरिता मला ताईच्या खांद्यावर लहान भावाच्या नात्यानं डोकं ठेवून मनसोक्त रडत मोकळी करायची होती.. तुझ्यापुढे कानशील पुढे करत बहिणीच्या हातच्या 2 चपराक खायच्या होत्या मी केलेल्या क्षुल्लक चुकांसाठी.. आई-वडील व ईश्वरानंतर ज्या व्यक्तीचे छायाचित्रात पाया पडत होतो त्या साक्षात मोठ्या ताईचे चरणस्पर्श करायचे होते पण सर्व ईच्छा अपु-याच राहिल्या..

त्या दिवशी तु मला उपवास असल्याने चम्मचभर साखर व पाणी प्यायला दिलं होतं.. आजही त्या साखरेचा गोडवा प्रसाद व पाण्याची चव अमृत म्हणून जीभेवर आहे.. दुस-या दिवशी जाण्याचे नियोजन असतानाही तु मित्राचा वाढदिवस आटपून काही कारणास्तव त्याच रात्री स्वगावी परतलीस ती कायमचीच.. मला तु परतल्याचे तुझ्या-माझ्या मैत्रिणीकडून फोनवर कळलं.. आणि मी साठवून ठेवली ती मी पाहिलेली माझ्या ताईची शेवटची झलक.. तु रुमच्या रस्त्याकडे इंटरनेट कॅफे जवळून मैत्रिणीँसह वळत होतीस... अगं ताई हो त्याच मैत्रिणीचा आज वाढदिवस.. शुभेच्छा देण्यासाठी फोन केला असता कळलं की तुला प्राथमिक शिक्षिकेची स्वगावीच कायमस्वरुपी नोकरी लागलीय.. सर्वप्रथम तर तुझं अभिनंदन ताई... तत्पूर्वी मी रामटेकच्या दर्ग्यामध्ये जाऊन तुझ्यासाठी दुवा मागुन आलो होतो.. त्या रात्री शांत झोप यावी म्हणून मित्राला बोलावलं होतं.. ज्या नात्याची माझ्या काही मित्रमैत्रिणीँनी अवहेलना केली त्यातच काहीँनी खंबीरपणे आधारही दिला.. विशेषत: माझी बेस्ट फ्रेँड-तु जाणतेसच.. तरी त्या दिवशी झोपेपर्यँत 23 तारखेच्या पहाटेचे साडेचार झाले होते.. तु मला त्या भागात आल्यास नि:संकोच घरी येण्याचं आमंत्रण दिलं होतंस.. मी प्रयत्न करीन ताई पण हिँमत होईल माझी येण्याची??

23 तारखेला आदल्या दिवसाच्या सर्व आठवणी आठवत होत्या.. आणि तु मात्र गावी पोचलेली असशील.. मी सर्वप्रथम दार बंद करुन एकटाच हाथ-पाय आपटत ओरडत रडलो मात्र माझं ऐकायला तिथे कोणीच नव्हतं.. होत्या फक्त चार भिँती! त्या दिवशी अगदी वेड्यापिस्यासारखा रडलो मात्र तु परतणार थोडीच होतीस.. त्या रडण्याचं मी शब्दात वर्णन करुच शकत नाही.. नंतर मन हलकं झाल्यावर तुझ्या मैत्रिँणीची स्लॅम परतवण्यासाठी त्याच खोलीकडे पण यावेळी करमत नव्हतं.. मी आमगावी परतलो.. नंतर आपली भेट कधीच झाली नाही त्याला आज दोन वर्ष लोटलेत...

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